Wednesday, 21 August 2013

"Dreams Of Change"......मेरी कोशिश

The poem...and feelings...presented..is my first...venture into....the world of Passion, Revolutions....Rebellions.....and frustrations against this dying world...

…………
ये मेरी पहली सार्थक कोशिश है…. जहाँ मैं अपने भावनाओं की पीड़ा और सुख से दूर… कुछ  "ओज्पुर्र्ण " लिखूँ …… 
…… जहाँ मेरे शब्द इस बदलाव के माहौल की चिंगारी …. को थोड़ी हवा दे सके…. 
…… जहाँ मेरी कोशिश बंद पड़े उजले महलों की रौशनी को "सूर्य " का तेज़ दिखा सके…
………… 
The last ...paragraph...of the poem totally deviates from the original theme....
जहाँ मेरा डर  … मेरी कोशिश  को ज़ार ज़ार  कर देता है  …
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And those lines turns to satire....
......I hope my faith will be appreciated .....

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कई लोग फितरत बदल कर,
नियत बदल … 
सितारों को ढून्ढ लाते हैं  …. 
…… पर जब वो लौट  आते हैं … 
तो बंद मुट्ठी में राख पाते हैं … 
क्योंकि 
ये वो सितारे हैं  …. 
जो खुद अपनी ही आसमान को बेच खाते हैं … 
……. 
टूटी नियत को हमेशा  …. 
टूटे सितारे ही हाथ आते हैं  …. 
बंद मुट्ठी में राख पाते हैं … 
……. 
पर अब भी एक सितारा चमक रहा है वहां  …. 
अडिग, अविरल, निश्चल अपनी तेज़ से … 
……. जो लड़ता रहा बुरी फितरतों से बड़ी देर तक  …. 
चीटीं सा था वो …पर कुछ बात तो थी … 
की भीड़ चुका  था  …
भेडियों से …. और शेर तक …. 
पर है उम्मीद अब भी  …
की जब मैं उसे लाने जाऊँगा  …. 
लौटूंगा कुछ ले कर  … ठोस नव-निर्माण को ही  …. 
ख़ाक हो जाऊँगा सही  …. 
पर राख ले कर न आऊँगा  …
……… 
क्या फ़िक्क्र की जो मेरा, सितारा होगा  … 
वो लाख में इक का ही प्यारा  होगा,
………….
थोड़ी मध्हिम होगी उसकी चमक … सच है …
पर रोशिनी होगी ज़ोर  की …
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
…………
तलाशनी है काग़ज़ी, महलों को छोड़ ….
एक नए "अडिग" ठौर की …. 
एक उदयमान नए भोर की  ….
की सिस्कारियों और फुसफुसाहटों, का वक़्त नहीं  ….
एक स्वछंद "गर्जना" सी शोर की  ….
सब को पीरो, कर जो रख सके  …
वो बिना छोर के डोर की  ……
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
की सारी  गंदगी सिमट चुकी  ….
की पहुँच चुके "हिम" की छोटी से विसर्जन को  …
कोई बात नहीं  ….
की अब तक था साथ नहीं ….
………….
मैंने भी तो खुद को बंद कर लिया था …
अपने ही बनाए अंधेरों में  …
कहता था  ….
मैं क्यों  ….
जब मुझे कोई आघात नहीं  …
………….
अब "मै-तू" की बात नहीं   …
वक़्त है "हम" से होने वाले शोर की  …
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
हिम की छोटी से विसर्जित करे  …
अपनी मैली मिटटी को आज " गंगा"  में  ….
की वक़्त आ गया है  ….
हर " इंसान" या "आदमी" ही सही  …
के दिल से निकली एक "जोर" की  …
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
……………
थक गया हूँ  … 
हर रोज़ एक ही सपने से  …. 
क्षण-भंगुर  अपनों से  …. 
…………. 
और वही लाचारी अगले भोर की  …. 
हलक में ही दम तोड़ती शोर की  ……… 
खुद को ही  …दफ़न करने को अमादा …. 
मन में छुपे उस चोर की  …. 
……… 
की शायद थम गया है  …. 
मेरी व्याकुलता के सिरहाने  …
बात नव-निर्मित … नए दौर की ….  
……………. 
थक गया हूँ  …
आम आदमी और ख़ास के अस्तित्व की जंग से  …. 
हर रोज़  "भारत" को शब्दों से बदलने वाले …. 
कवियों के रंग से  …
…………
…………. 
थोड़ा घबरा सा गया हूँ  ……… 
उसी बंद कमरे में  … 
फिर अपने घर आ गया हूँ मैं  ……
…………
उसी बंद कमरे में  … 
फिर अपने घर आ गया हूँ मैं  ……