इस प्रगतिशील संसार संसार में .......
हर रोज़ नव-निर्माण होता है ………
हर पल एक बदलाव होता है ………
…… कोई चीज़ स्थिर नहीं ………
………ऐसा प्रतीत होता है कि ………
इन क्षण-भंगुर ख़्वाबों के इमारतों के बीच ………
इंसान और इंसानियत ………दम तोड़ रही हो ………
……… उन गुबाड़ों के बीच ………
अपने बालकनी से झांकते हुए ………
इमारतों से ऊँची मशीनों को ताकते हुए ………
स्ट्रीट लाइट्स के जख़ीरों के बीच ………
जिनके सामने सूर्य का तेज़ ……और चन्द्रमा का सौंदर्य भी फीका पड़ जाए ………
वैसे ही उभरते हुए विचारों को शब्दों में समेटने की कोशिश कर रहा हूँ ………
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कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ .... (ठौर: ठिकाना / मकान )
दोस्त तो लाखों मिले ....
मगर ....
कोई "रक़ीब" ढूंढ़ता हूँ (रक़ीब: फ्रेंड-फिलॉस्फर ) ....
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निवालों से सजी …
इस बेरंग थाल में …
जो भूख मिटा सके …
वो इक "कौड़"…( कौड़: निवाला )…
ढूंढ़ता हूँ …
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कंक्रीट के जंगलों में ....कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
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किसे पहचानूं …
किसे तकलीफ दूँ …
इस अज़नबी शहर में …
जब खुद में ही छुपा
कोई "और" ढूंढ़ता हूँ …
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कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
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सुन्न हो चुका है ये मन …
आत्मा स्थिर …
सांसें भी मध्यम हैं …
संवेदनाएं अधीर …
मुझको जो जीवित कर सके …
वो असहाय "शोर" ढूंढ़ता हूँ …
………कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
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अमावस की ....
तमस साया ....
खुद को छलती ....
खुद की काया ....
छुपे सूरज से ....
दिग्भ्रमित .... निरंतर रात ....
बिन उजालों से ....
व्यथित ....
जो हो रही है जाया ....
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मुझ पर भी फूटे ....
किरणों के तेज़ से ....
उद्वेलित ....
वो एक नयी ....
"भोर" ढूंढ़ता हूँ ....
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कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
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है छल-प्रपंच से ....
प्रज्जवलित ....
सांसें तो है ....
पर वो है भ्रमित ....
स्वप्प्न तो है ....
मगर खुद में ही ....
खंडित ....
पोथी-पुराणों के ज्ञाण से ....
भ्रमित-चकित ....
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सबको क्षणिक ....
नाम कर ....
इस मृत जीवन को ....
प्रणाम कर ....
नए सृजन-नव जीवन ....
का "दौर" ढूंढ़ता हूँ ....
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कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
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