कभी कभी एक चेतना ....... ज़िन्दगी के कुछ आयाम ……
जिसे हम "महत्वकाँक्षा" "अपेक्षाएं" ……
के नाम से जानते हैं ....
किसी मोड़ पर आप अपने आप को … ठगा .… व्याकुल महसूस करते हैं ....
जब आपकी "सच्चाई" आपके "अस्तित्व" से मात खा जाती है …
जिसे हम "महत्वकाँक्षा" "अपेक्षाएं" ……
के नाम से जानते हैं ....
किसी मोड़ पर आप अपने आप को … ठगा .… व्याकुल महसूस करते हैं ....
जब आपकी "सच्चाई" आपके "अस्तित्व" से मात खा जाती है …
……………
और यही व्याकुलता ……………
जन्म् देती है आपके अंतर-आत्मा के आवाज़ को ....
नयी चेतना का आभास होता है
ऐसा लगता है किसी ने ....
रूह को झंझोड़ दिया हो जैसे ……
………………………मेरी कविता उन व्याकुल पलों में ..........
नव-आकार लेती हुयी सृजनात्मक कोशिश हैं ....
…………………………
…………………………
मैं वो नहीं जो आज हूँ .......
दम तोड़ती… धीमी आवाज़ हूँ .......
बिखड़ा पड़ा हूँ कोने में .......
किसी आंधी के गुजरने पर .......
बेकशीष ग़ज़ल का .......
बेसुरा साज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ
…………
.............
मैं वो नहीं जो आज हूँ
डरा सहमा सा .......
बुझते लौ कि .......
साँसों के हिसाब जैसा .......
डूबते सूरज कि .......
रात के हिजाब जैसा .......
बेमियादी … बे-मुरब्बत नमाज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ
…………………
…………………
मैं वो नहीं जो आज हूँ
जो किसी का जुस्त-जू न हो
वो दवा
जो दर्द का सूकून न हो
वो ख्वाब
जो आरज़ू न हो
वो शख्श
जिसका वज़ू न हो
जो खुद से हो शर्मिंदा, वो लाज़ हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ
……………
……………
मैं वो नहीं जो आज हूँ
दर्द हूँ दिल का .......
चिपटा हुआ नासूर हूँ .......
सुर और प्यालों में गिरफ्त .......
कोई बेसुध मगरूर हूँ .......
मौत कि और धकेलती .......
वो मर्ज़ .... वो सुरूर हूँ .......
खुद पे बोझ .......
खुद से दूर हूँ .......
जिसका कोई अंज़ाम न हो … वो आग़ाज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ
...................
...................
मैं वो नहीं जो आज हूँ
धड़कते लौ कि बात तो छोड़ो.......
मृत.……विहीन राख़ हूँ…
बे-क़दर … बेनाम साख हूँ …
खोटे सिक्के भी चिढ़ाये जिसे
वो बिखड़ा पड़ा .... लाख हूँ
वो अछूत … अनचाहा परवाज़ हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ
……………
……………
किसी दिल का धड़कन .......
या तमन्ना किसी का .......
किसी का बेरंग ख़वाब .......
तो किसी का बेमानी महफ़िल .......
किसी कि बे-मुराद मोहब्बत .......
तो… किसी के नफरत का पैमाना .......
किसी कि चोट .......
किसी के दिल का गुबार .......
रेत पर मौत बांटती "मिराज़" हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ
………………
………………
कुछ लम्हों में मेरा कल खो गया हो जैसे
एक ज़िंदा दिल……खुद में खुदा सो गया हो जैसे
…………………
…………………
मैं आह था …… चाह था .......
भीड़ में एक वाह था .......
आसमान को छूता था.…… मैं अपनी मर्ज़ी से .......
बेफिक्र … था प्रबल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था .......
……………
.................
मैं क्यों नहीं जो कल था
प्रखर…तेज़ मेरे माथे पर .......
तारों को तोड़ रखता था सिरहाने में .......
खुद में अखंड था …… अचल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था
……………
.................
मैं क्यों नहीं जो कल था
अद्वितीय …… असाधारण
अदभुत … अलौकिक
अतुलनीय …… अविस्मरणीय
असंख्य ....... अमौलिक
आमोद … अविरल था
मैं क्यों नहीं जो कल था
………………
.....................
मैं क्यों नहीं जो कल था
शिव सा सुरीला साज़ था .......
खुदाया बन्दा ए-परवाज़ था .......
सिंह के गर्ज़ना सा आवाज़ था .......
खुदा का नूर…… खुदाया का नाज़ था .......
दुनिया थी मेरे लिए .......
सब कहते थी कि अव्वल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था मैं क्यों नहीं जो कल था
.............
………...
आज कल के चीड़ में
आगे निकलती इस भीड़ में
कल से नयी शुरुआत हो
जो दोस्त हैं वो साथ हो
जो थे नहीं वो छुट गए
मेरे साथ मुझको लूट गए
..............
…………
अब एक और खेलनी बारी है
इस बार ज़ोर कि तैयारी है
जो मैं जीतूं सब साथ रहे
क्यों आज कल कि बात कहें
है ढेर उम्र मुंह तकता हुआ
मेरे आज कल को ठगता हुआ
................
................
यह मुर्ख द्वन्द सब छलना है
मेरे सूरज को कहाँ अब ढलना है
है तेज़ भरा…अविजित खड़ा
………….
................
जो सफल होगा वो आज पड़ा
जो सफल होगा वो आज पड़ा