Thursday, 24 September 2015

"विस्मृत " The Concrete World

इस प्रगतिशील संसार संसार में ....... 
हर रोज़ नव-निर्माण होता है ………
हर पल एक बदलाव होता है ………
…… कोई चीज़ स्थिर नहीं ………
………ऐसा प्रतीत होता है कि ………
इन क्षण-भंगुर ख़्वाबों के इमारतों के बीच ………
इंसान और इंसानियत ………दम तोड़ रही हो ………
……… उन गुबाड़ों के बीच ………
अपने बालकनी से झांकते हुए ………
इमारतों से ऊँची मशीनों को ताकते हुए ………
स्ट्रीट लाइट्स के जख़ीरों के बीच ………
जिनके सामने  सूर्य का तेज़ ……और चन्द्रमा का सौंदर्य भी फीका पड़ जाए ………
वैसे ही उभरते हुए विचारों को शब्दों में समेटने की कोशिश कर रहा हूँ ………
………………………………………
………………………………………
कंक्रीट के जंगलों में .... 
कोई ठोस .... 
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ .... (ठौर: ठिकाना / मकान )
दोस्त तो लाखों मिले .... 
मगर .... 
कोई "रक़ीब" ढूंढ़ता हूँ (रक़ीब: फ्रेंड-फिलॉस्फर ) ....
…………………
…………………
निवालों से सजी …
इस बेरंग थाल में …
जो भूख मिटा सके …
वो इक "कौड़"…( कौड़: निवाला )…
ढूंढ़ता हूँ …
………
कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
………………
………………
किसे पहचानूं …
किसे तकलीफ दूँ …
इस अज़नबी शहर में …
जब  खुद में ही छुपा
कोई "और" ढूंढ़ता हूँ …
………
कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
………………
………………
सुन्न हो चुका है ये मन …
आत्मा स्थिर …
सांसें भी मध्यम हैं … 
संवेदनाएं अधीर … 
मुझको जो जीवित कर सके … 
वो असहाय "शोर" ढूंढ़ता हूँ … 
………
कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
………………
………………
अमावस की ....
तमस साया ....
खुद को छलती ....
खुद की काया ....
छुपे सूरज से ....
दिग्भ्रमित .... निरंतर रात ....
बिन उजालों से ....
व्यथित ....
जो हो रही है जाया ....
....................
मुझ पर भी  फूटे ....
किरणों  के तेज़ से ....
उद्वेलित ....
वो एक नयी ....
"भोर" ढूंढ़ता हूँ ....
………
कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
………………
………………
है छल-प्रपंच से ....
प्रज्जवलित ....
सांसें  तो है ....
पर वो है भ्रमित ....
स्वप्प्न तो है ....
मगर खुद में ही ....
खंडित ....
पोथी-पुराणों के ज्ञाण से ....
भ्रमित-चकित ....
................
सबको क्षणिक ....
नाम कर ....
इस मृत जीवन को ....
प्रणाम कर ....
नए सृजन-नव जीवन ....
का "दौर" ढूंढ़ता हूँ ....
………
कंक्रीट के जंगलों में ....
कोई ठोस ....
"ठौर" ढूंढ़ता हूँ ....
………………
………………

Monday, 29 September 2014

"मरणासन मनुष्य" (दम तोड़ती संवेदनाएं )

आजकल के भीड़ में …… 
नित  परिवर्तित "देह" चिर में ……
ठंडी पड़ी इस क्षीर में ……… 
………………………
उन जज़्बातों को भी उभरने का समय नहीं मिल पाता। ................
जो की ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर, हमारे साँसों का पर्याय बन चुकी थी ………………
………………………………
वे संवेदनाएं भी मर चुकी है ………
जो कभी हमें संस्कारों के रूप में विरासत में मिली थी ………
…………………………
वो ख्याल, यादें भी भ्रमित करती है ………
जो, ओंठों पे मुस्कान या आँखों में आंसूं का सबब बनते थे  .............

……………………
हम
इस प्लॉस्टिक से निरंतर बनती हुयी दुनिया के मायाजाल में, इस तरह उलझते जा रहे  हैं ……………
भौतिक ... क्षणिक खुशियों के अंधे दौड़ में इस तरह से शामिल होते जा रहे हैं ......................
…………………………
की हमें तब तक किसी की याद नहीं आती ……
कि....
जब तक कोई महफ़िल न सजे
कोई हमें रूह तक झकझोर न दे
………………………
मेरा ये कलाम …………
इसी "बेरंग" दुनिया को आइना दिखने की एक छोटी सी कोशिश है ……………
…….......
ऐसा लगता है की, प्लास्टिक के इस दुनिया में ………
रबड़ से बने लोगों के बीच,
"जज़्बातों" को भी धुप लगाना जरूरी है ………
वरना
ये भी "कूड़े-करकट" में तब्दील हो जाएंगे ………
…………………………
.....................................

कुछ बू इस क़दर फैली है ………
आजकल इस जहाँ में ………
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए ………
एक सुरूर होना चाहिए ………
कोई सामने जरूर होना चाहिए ………
.........................
………………….
न जाने, ये कौन सी जात है ………
इंसानियत की ………
की ज़िंदा लोगों से डर लगता है ………
की, मुहब्बत भरी निगाहों का भी, नज़र लगता है ………
बंद दरवाज़ों के पीछे ………
खिरकियों के परदे तले ………
बंद लोगों को वही शहर लगता है ………
और ………
न जाने क्यों, लोग तभी अच्छे लगते हैं ………
या किसी पे बेशुमार प्यार आने के लिए,
उसका मरना जरूरी है ………
या, वो हमसे ………
दूर बहुत दूर होना चाहिए
………………………
………………………
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होना चाहिए 
कोई सामने जरूर होना चाहिए 
……………………
…………………… 
अब कहाँ वो आशिक़ी का आलम 
वो सूरत सीरत की बातें 
वो दास्ताने "हीर-रांझा" की 
एक दूसरे के निगाहों में डूब कर 
बितायी गयी रातें 
……………………
अब दिल सीने में नहीं, धड़कता है हथेलियों पर ………
न परवाह, लैला है या हीर है ………
है जरूरत की बस ………
कोई नूर होनी चाहिए ………
………………………
………………………
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होना चाहिए 
कोई सामने जरूर होना चाहिए 
……………………
…………………… 
और, जब हालत ऐसे बन ही चुके ………
और, सच्चाई कोसती है हर पल ………
की अब बर्दाश्त नहीं होता ………
खुद को धोखे में रखना ………
……………… 
की 
देश - प्रदेश 
प्यार - मुहब्बत 
माँ - बाप 
रिश्ते - नाते 
छूटते चले जा रहे हैं, पीछे हर पल 
और 
अगर उनकी याद ही आती है जब, कोई 
जोरों, से झंझोरता है 
किसी महफ़िल के प्यालों के सुरूर में 
………………………… 
…………………………
तो मेरी मानिए 
ए-हुज़ूर 
ऐसी सुरूर के लिए 
टूटे गरूर के लिए 
ऐसी महफ़िलें 
यदा-कदा ही सही 
तेरे घर, या मेरे ठौर पे सही 
ऐसी महफ़िलें 
जरूर होनी चाहिए 
जरूर होनी चाहिए 
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होनी चाहिए 
एक सुरूर होनी चाहिए
 ……………………… 
………………………
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होना चाहिए 
कोई सामने जरूर होना चाहिए 
……………………
…………………… 


Tuesday, 31 December 2013

" मैं " (The Frustrations.....Past !!!! Present !!!! Future)

कभी कभी एक चेतना .......  ज़िन्दगी के कुछ आयाम ……
जिसे हम "महत्वकाँक्षा" "अपेक्षाएं" ……
के नाम से जानते हैं ....
किसी मोड़ पर आप अपने आप को … ठगा .… व्याकुल महसूस करते हैं ....
जब आपकी "सच्चाई" आपके "अस्तित्व" से मात खा जाती है … 
…………… 
और यही व्याकुलता ……………
जन्म् देती है आपके अंतर-आत्मा के आवाज़ को .... 
नयी चेतना का आभास होता है 
ऐसा लगता है किसी ने .... 
रूह को झंझोड़ दिया हो जैसे …… 
………………………
मेरी कविता उन व्याकुल पलों में .......... 
नव-आकार  लेती हुयी सृजनात्मक कोशिश हैं .... 
…………………………
…………………………
मैं वो नहीं जो आज हूँ .......
दम तोड़ती… धीमी आवाज़ हूँ .......
बिखड़ा पड़ा हूँ कोने में .......
किसी आंधी के गुजरने पर .......
बेकशीष  ग़ज़ल का .......
बेसुरा साज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
…………
.............
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
डरा सहमा सा .......
बुझते लौ कि .......
साँसों के हिसाब जैसा .......
डूबते सूरज कि .......
रात के हिजाब जैसा .......
बेमियादी … बे-मुरब्बत नमाज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
…………………
…………………
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
जो किसी का जुस्त-जू न हो
वो दवा
जो दर्द का सूकून  न हो
वो ख्वाब
जो आरज़ू न हो
वो शख्श
जिसका वज़ू  न हो
जो खुद से हो शर्मिंदा, वो लाज़  हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
……………
……………
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
दर्द हूँ दिल का .......
चिपटा हुआ नासूर हूँ .......
सुर और प्यालों में गिरफ्त .......
कोई बेसुध मगरूर हूँ .......
मौत कि और धकेलती .......
वो मर्ज़ ....  वो सुरूर हूँ .......
खुद पे बोझ .......
खुद से दूर हूँ .......
जिसका कोई अंज़ाम न हो … वो आग़ाज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
...................
...................
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
धड़कते लौ कि बात तो छोड़ो.......
मृत.……विहीन राख़ हूँ…
बे-क़दर … बेनाम साख हूँ …
खोटे सिक्के भी चिढ़ाये जिसे 
वो बिखड़ा पड़ा .... लाख हूँ 
वो अछूत … अनचाहा परवाज़ हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
……………
……………
किसी दिल का धड़कन .......
या तमन्ना किसी का .......
किसी का बेरंग ख़वाब .......
तो किसी  का बेमानी महफ़िल .......
किसी कि  बे-मुराद मोहब्बत .......
तो… किसी के नफरत का पैमाना .......
किसी कि चोट .......
किसी के दिल का गुबार .......
रेत  पर मौत बांटती "मिराज़" हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
………………
………………
कुछ लम्हों में मेरा कल खो गया हो जैसे 
एक ज़िंदा दिल……खुद में खुदा  सो गया हो जैसे  
…………………
…………………
मैं आह था ……  चाह था .......
भीड़ में एक वाह था .......
आसमान को छूता था.…… मैं अपनी मर्ज़ी से .......
बेफिक्र … था प्रबल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था ....... 
……………
.................
मैं क्यों नहीं जो कल था 
प्रखर…तेज़ मेरे माथे पर .......
तारों को तोड़ रखता था सिरहाने में .......
खुद में अखंड था …… अचल था ....... 
मैं क्यों नहीं जो कल था 
……………
.................
मैं क्यों नहीं जो कल था 
अद्वितीय …… असाधारण
अदभुत … अलौकिक
अतुलनीय …… अविस्मरणीय
असंख्य ....... अमौलिक
आमोद … अविरल था
मैं क्यों नहीं जो कल था 
………………
.....................
मैं क्यों नहीं जो कल था 
शिव सा सुरीला साज़ था .......
खुदाया बन्दा ए-परवाज़ था .......
सिंह के गर्ज़ना सा आवाज़ था .......
खुदा का नूर…… खुदाया का नाज़ था .......
दुनिया थी मेरे लिए .......
सब कहते थी कि अव्वल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था मैं क्यों नहीं जो कल था 
.............
………...
आज कल के चीड़ में 
आगे निकलती इस भीड़ में 
कल से नयी शुरुआत हो 
जो दोस्त हैं वो साथ हो 
जो थे नहीं वो छुट गए 
मेरे साथ मुझको लूट गए 
.............. 
………… 
अब एक और खेलनी बारी है 
इस बार ज़ोर कि तैयारी है 
जो मैं जीतूं सब साथ रहे 
क्यों आज कल कि बात कहें 
है ढेर उम्र मुंह तकता हुआ 
मेरे आज कल को ठगता हुआ 
................
................
यह मुर्ख  द्वन्द  सब छलना है 
मेरे सूरज  को कहाँ अब ढलना है 
है तेज़ भरा…अविजित खड़ा 
………….
................
जो सफल होगा वो आज पड़ा 
जो सफल होगा वो आज पड़ा 


Sunday, 17 November 2013

सचिन …… सचिन ......


एक शानदार व्यक्तित्व ……
एक अविस्मर्णीय करियर .......
एक प्रेरणादायी जीवन ……
भारत रत्न श्री सचिन रमेश तेंदुलकर ……
को समर्पित ……
..................x ................... 

ये सोच कर.....  
कि तुम्हे… कतार में.… 
कल ढूढेंगी निगाहें…
…………  
ना पहले जैसी…
बात होगी 
ना जोश होगा…… 
ना तालियों में दम.…… 
करतल ध्वनि भी होगी .... मध्यम…… 
…… 
ना हारने का डर.…… 
ना जीतने का स्वर…
शायद वो समय चल पड़ेगा 
जो जाता था ठहर.…
……
ना कोई सवाल होगा....... 
ना कोई बवाल होगा……  
दिल को जल्द ही मना लेंगे…… 
कि अब फिर से 
ना कोई कमाल  होगा…… 
……… 
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
....... 
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
…… 
दुश्मनों कि 
तेज़ तलवारें तो होंगी 
पर तुम सा.…… 
ना ढाल होगा…
………… 
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
……… 
सोने से भारत के 
स्वर्णिम उपलभ्दियों....... 
का शायद…
अब न कोई साल होगा…… 
..........
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
…….......  
ना शिक़वा……
ना शिकायत होगी.......... 
सीधे प्रसारण कि भी 
ना अब कोई चाहत होगी……
………… 
कि अब भी कोई 
जूझ रहा अकेले 
ऐसी भी न राहत होगी……… 
…….... 
ना अब इक ही जगह……
पाऊँ टिकाने.......  
कि जरूरत होगी 
ना ही....... इक टीवी से चिपके……
सौ सूरत होगी………
....... 
न भूखे रहने कि 
गुज़ारिश…… 
न प्यासे रहने कि 
ख़वाहिश....... 
....... 
ना साँसों पे अंकुश……
ना बोलने की  मनाही....... 
ना सुनसान सड़के
ना खाली कढ़ाही 
…… 
ना झूमता घर होगा … 
ना कोई परिवार होगा......
अब न सप्ताह का हर दिन…
जैसे रविवार होगा 
...........  
सब ज्यों का त्यों है……
बस इतनी सी कमी खलेगी….... 
…… 
आज सोलह नवंबर
दो हज़ार तेरह से 
कि अब न मेरा भगवान्, मेरा ख़ुदा  
खेलने वाला…
क्रिकेट मैच तो……
कई बार होगा 
कई बार होगा 

Tuesday, 29 October 2013

"बिखरे ख्याल…कुरेद्ते ग़ुबार"

मेरे मन में …मेरे शेरो-शायरी का वो भी जख़ीरा है… 
…जो  खुद -बा-खुद  ……… लब्ज़ों में बयां हो जाते हैं  ……
.......... जब मन बोझिल हो जाता है  …… 
………जब हृदय स्थिर…… 
और आत्मा बैचेन हो उठती है ………… 
................ 
वैसे ही कुछ ख्यालों को …… गुबारों को समेटने कि कोशिश कर रहा हूँ  …… 
………
............
अर्र्ज़ है 
………… 
१.
.… कई सालों से ……
… कोई दस्तक दे कर …
… मेरे ज़ख्मों को कुरेद जाता है .... 
…… 
…और पूछता हूँ जो सबब ....... 
… तो बस ये आवाज़ आती है .... 
…………… 
कि तेरे हरे ज़ख्मों, से जो कराह आती है  …
… तेरी याद बन कर…… 
.... सुकून से उन लम्हों में  …
.... चैन से सो लेता  हूँ …
……… 
बांकी पल …
ये खुदाया का कुफ्र …है कि  …
………
तेरी याद में रो लेता हूँ .... 
………
कि तेरे हरे ज़ख्मों, से जो कराह आती है  …
… तेरी याद बन कर……
.... सुकून से उन लम्हों में  …
.... चैन से सो लेता  हूँ …
…………………x ………………
…………………x ………………
२.
… तेर हर अर्र्ज़ को .... 
.... मैं अपना फ़र्ज़ समझ …
.... क़बूल किया …
.......... 
… तेर हर अर्र्ज़ को ....
.... मैं अपना फ़र्ज़ समझ …
.... क़बूल किया …
..........
… कि.…
शायद एक खुदा के रहते.......
किसी और को ख़ुदा बनाने का…
मैंने भूल किया  ……
..........
… तेर हर अर्र्ज़ को ....
.... मैं अपना फ़र्ज़ समझ …
.... क़बूल किया …
…………………x ………………
…………………x ………………
३.
खुदा  भी जिसके नूर से .......
हैरान था…
परेशान था ....
ख़ामोश रहा…
.............
.............
मैं वो बन्दा हूँ  …
जिसने तेरी नियत टटोली…
और बे-पर्दा किया ……
…………………x ………………
…………………x ………………
४.
मेरे इक ज़िक्र से ही.……
तेरे चेहरे पर.…
ज़ो .... आ जाती  रौनक़ ....
…………
ये इशारा है …
इस महफ़िल को ....
कि.…
कोई दर्द छिपा रखा है....
………………
कि बेवफा का ही लिबास ओढ़े रखना ……
जब पत्थर उछले जाए मेरी तरफ़  .......

कि इक आंसूं भी बहा …
तो बयां हो जायेगी……
खुद -बा -खुद  ……
………
तेरे छलकते काज़ल से ही सही ....
……
वो
.... बे-इन्तहां  मुहब्बत ……
जो तूने दिल में दबा रखा है  ……
..........
कोई दर्द छिपा रखा है....
…………………x ………………
…………………x ………………
५.
……है कुचलने  को अमादा ……
… एक इंसान यहाँ ....
... दूसरे  इंसान को ....
अपने पैरों तले .......
………
……है कुचलने  को अमादा ……
… एक इंसान यहाँ ....
... दूसरे  इंसान को ....
अपने पैरों तले .......
……
सबब पूछो  ……
तो बड़ी तबियत से कहते हैं कि …
………
वो रोटी बड़ी बेस्वादी सी लगती है  …
जिस पर  किसी गैर का, नाम न लिखा हो ……
…………
रूह कि प्यास बुझती  ही नहीं .......
जब तक……
लहू न मिलायी जाए ……
………
……है कुचलने  को अमादा ……
… एक इंसान यहाँ ....
... दूसरे  इंसान को ....
अपने पैरों तले .......
…………………x ………………
…………………x ………………
६.
… हो तेरे  ख्वाहिशों …
में वज़न इतना …
..........
कि जिन रास्तों से ……
तू भटक भी जाए ……
…………
वो मंज़िल-ए -पाक हो कायनात की …
वो मंज़िल-ए -पाक हो कायनात की …






Tuesday, 22 October 2013

"धुंद " ( श्री जगजीत सिंह को समर्पित )

 …ये ग़ज़ल… मैं " ग़ज़ल सम्राट " श्री जगजीत सिंह को समर्पित करता हूँ …
…… जिनके रेशमी आवाज़…………
…… इक अलग ही अंदाज़े-बयां  …….
… और रूह को भी झकझोर कर रख देने वाला…… शब्दों का तर्क़श  ……
के मेरे ज़िन्दगी में एक ख़ास आयाम है  …. महत्व है …
………
 उन भावनाओं को  पीड़ोना, उसे सार्थक करना……. किसी  महासागर के प्यास को….  दो बूँद …
पानी से बुझाने के समान  है  …………
…………………….
......Like millions...Praying hearts and Souls....I firmly believe....
......The Immortal voice of Jagjit Saahab will.....rise again..to support this dying..complex...sophisticated world....with
...reaps of Love, Humanity....and an ample reason to live.

Let the legend....graced with thousands of years..of soulful divine melodies...
....Let the tribute begin......
…………
………… 
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
प्यार में गुज़रे हुये … कई साल छुपा रखा है ….
… दिल के कोने में …… 
………………. 
…. तेरी कसमों का झुरमुट, तेरे वादों का हिसाब ….
…. तेरी कसमों का झुरमुट, तेरे वादों का हिसाब ….
…… दुनिया से छुप-के, पहुंचाये हुए …. खतों का ज़वाब ….
…… दुनिया से छुप-के, पहुंचाये हुए …. खतों का ज़वाब ….
…  अब भी लिखता हूँ तेरी याद में …. गैरों के लिए ….
…  कोई वज़ह तो होगी बे-वफाई की …. ये ख्याल छुपा रखा है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
…………
मुझको सब जानने लगे, हो गया सब से क़रीब ……. 
इक तुझे छोड़ के सही …. हर इंसान मेरा रक़िब …
क्यों बना न सका तुझे  अपना ……सवाल खुद से छुपा रखा  है …. 
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
…………. 
तुझ से मिलने  का…… बिछुड़ने का ग़म मुझे ही क्यों मिला …
तेरी यादों का … तेरे इरादों का तोहफ़ा मुझे ही क्यों मिला …. 
तेरी अदाओं पर मेरा मरना …. दिल के चोटों का निशां  …. मुझे ही क्यों मिला … 
…………… 
…………… 
खुदाया…. किसी और दीवाने को तेर लिए बनाया होता … 
ये मलाल … छुपा रखा है  …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …



Wednesday, 21 August 2013

"Dreams Of Change"......मेरी कोशिश

The poem...and feelings...presented..is my first...venture into....the world of Passion, Revolutions....Rebellions.....and frustrations against this dying world...

…………
ये मेरी पहली सार्थक कोशिश है…. जहाँ मैं अपने भावनाओं की पीड़ा और सुख से दूर… कुछ  "ओज्पुर्र्ण " लिखूँ …… 
…… जहाँ मेरे शब्द इस बदलाव के माहौल की चिंगारी …. को थोड़ी हवा दे सके…. 
…… जहाँ मेरी कोशिश बंद पड़े उजले महलों की रौशनी को "सूर्य " का तेज़ दिखा सके…
………… 
The last ...paragraph...of the poem totally deviates from the original theme....
जहाँ मेरा डर  … मेरी कोशिश  को ज़ार ज़ार  कर देता है  …
............... 
And those lines turns to satire....
......I hope my faith will be appreciated .....

...............................................
कई लोग फितरत बदल कर,
नियत बदल … 
सितारों को ढून्ढ लाते हैं  …. 
…… पर जब वो लौट  आते हैं … 
तो बंद मुट्ठी में राख पाते हैं … 
क्योंकि 
ये वो सितारे हैं  …. 
जो खुद अपनी ही आसमान को बेच खाते हैं … 
……. 
टूटी नियत को हमेशा  …. 
टूटे सितारे ही हाथ आते हैं  …. 
बंद मुट्ठी में राख पाते हैं … 
……. 
पर अब भी एक सितारा चमक रहा है वहां  …. 
अडिग, अविरल, निश्चल अपनी तेज़ से … 
……. जो लड़ता रहा बुरी फितरतों से बड़ी देर तक  …. 
चीटीं सा था वो …पर कुछ बात तो थी … 
की भीड़ चुका  था  …
भेडियों से …. और शेर तक …. 
पर है उम्मीद अब भी  …
की जब मैं उसे लाने जाऊँगा  …. 
लौटूंगा कुछ ले कर  … ठोस नव-निर्माण को ही  …. 
ख़ाक हो जाऊँगा सही  …. 
पर राख ले कर न आऊँगा  …
……… 
क्या फ़िक्क्र की जो मेरा, सितारा होगा  … 
वो लाख में इक का ही प्यारा  होगा,
………….
थोड़ी मध्हिम होगी उसकी चमक … सच है …
पर रोशिनी होगी ज़ोर  की …
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
…………
तलाशनी है काग़ज़ी, महलों को छोड़ ….
एक नए "अडिग" ठौर की …. 
एक उदयमान नए भोर की  ….
की सिस्कारियों और फुसफुसाहटों, का वक़्त नहीं  ….
एक स्वछंद "गर्जना" सी शोर की  ….
सब को पीरो, कर जो रख सके  …
वो बिना छोर के डोर की  ……
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
की सारी  गंदगी सिमट चुकी  ….
की पहुँच चुके "हिम" की छोटी से विसर्जन को  …
कोई बात नहीं  ….
की अब तक था साथ नहीं ….
………….
मैंने भी तो खुद को बंद कर लिया था …
अपने ही बनाए अंधेरों में  …
कहता था  ….
मैं क्यों  ….
जब मुझे कोई आघात नहीं  …
………….
अब "मै-तू" की बात नहीं   …
वक़्त है "हम" से होने वाले शोर की  …
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
हिम की छोटी से विसर्जित करे  …
अपनी मैली मिटटी को आज " गंगा"  में  ….
की वक़्त आ गया है  ….
हर " इंसान" या "आदमी" ही सही  …
के दिल से निकली एक "जोर" की  …
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
……………
थक गया हूँ  … 
हर रोज़ एक ही सपने से  …. 
क्षण-भंगुर  अपनों से  …. 
…………. 
और वही लाचारी अगले भोर की  …. 
हलक में ही दम तोड़ती शोर की  ……… 
खुद को ही  …दफ़न करने को अमादा …. 
मन में छुपे उस चोर की  …. 
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की शायद थम गया है  …. 
मेरी व्याकुलता के सिरहाने  …
बात नव-निर्मित … नए दौर की ….  
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थक गया हूँ  …
आम आदमी और ख़ास के अस्तित्व की जंग से  …. 
हर रोज़  "भारत" को शब्दों से बदलने वाले …. 
कवियों के रंग से  …
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थोड़ा घबरा सा गया हूँ  ……… 
उसी बंद कमरे में  … 
फिर अपने घर आ गया हूँ मैं  ……
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उसी बंद कमरे में  … 
फिर अपने घर आ गया हूँ मैं  ……