Thursday, 28 March 2013

अनछुए जज़्बात

अर्र्ज़ है ......

(१).......
किसी कि याद में डूब जाना,
मय की तौहीन है .....
.....मेरे दोस्त तू आशिक़ नहीं ...
शौकीन है…शौक़िन है .....
...................................
...................................
(२).......
......यूं  चौक इस मत दुनिया में ....
की हमने सब को बदलते देखा है ....
.....सोचा था, मय से तौबा कर लूं ...तेरे वादों पे.....
आज ख़ुद खुदा को बहकते  देखा है ...
.......
की हमनें सबको बदलते देखा है ......












Tuesday, 26 March 2013

"शराब और शवाब "

.........( मेरे मय पसंद दोस्तों के लिये ).............

अर्र्ज़ है .......
..................
क्यों लगा है इंतज़ाम -ए  मर्र्ज़ .....
दिल टूटने का .......
.................
क्यों लगा है इंतज़ाम -ए  मर्र्ज़ .....
दिल टूटने का .......
..............
कुछ और दिल लगा ले ...
.....कि अभी तेरी ...औक़ात बांकी है… 
..............
..............
...क्यों तुझे हो ग़म, दिल टूटने का .....
.....कि अभी तेरी ...औक़ात बांकी है… 
......को ग़र ....
...तू अगर पीना चाहे .....
...तो खुदा तेरा साकी है…. 
...तो खुदा तेरा साकी है…. 
................
क्यों लगा है इंतज़ाम -ए  मर्र्ज़ .....
दिल टूटने का .......









Monday, 25 March 2013

काश" ( कभी यूं भी तो हो )

इक लम्बे इंतज़ार के बाद… 

...............
कभी कभी ज़िन्दगी में, वो मोड़ भी आता है…
जब दर्द ही मरहम बन जाए .....
...उस पल में टूटे दिलों में, ये ख़याल जरूर आता है कि… 
.......अब ज़िन्दगी संवर जाए भी तो क्या ...
.......जो दर्द हद है….वो गुज़र जाए भी तो क्या ......
..................................................
ऐसे ही अनछूए पलों को कुरेदती हुयी नज़्म ..
अर्र्ज़ है…. 
.............................
.............................
सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो……. 
कि ...
जिसके दीदार से छुपते रहे, ता-उम्र .....
अब उससे मुलाक़ात हो तो क्या हो......
.........
सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
........
कि ...
धूप बनकर जो चुभती रही, उजालों में ....
उसके घने गेसुओं के साए में,
इक रात हो तो क्या हो...................
.............

सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
................
कि .....
मेरी प्यास, जिसे "मृगतृष्णा" का साथ रहा हमेंशा.......("मृगतृष्णा": Mirage)
आज डूब भी जाऊं ,
प्यार के बरसात में, तो क्या हो......
.................

सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
.........
कि......
हाँ ज़िन्दगी, आसां होती ....
फूलों के सेज़ पर, जवां होती ......


............
हाँ ज़िन्दगी, आसां होती ....
फूलों के सेज़ पर, जवां होती ......
........
लेकिन इक शायर.....
को दर्द का साथ ना हो, तो क्या हो ......
...............

सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
















शिक़्वा .......शिकायत ......

अर्र्ज़ है…
.................
....उन्हें ये ग़लतफ़हमी ....कि हम उन्हें याद नहीं करते...
....उन्हें ये ग़लतफ़हमी ....कि हम उन्हें याद नहीं करते...
.....................ये बात और है कि ....
.....................हमने हर पल जशन मनाया, उन्हें भूलने का .....

"ख्याल"


अर्ज़ है ....

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...ज़रा शीशा तो उठा ,...दो जाम बना ले- ऐ साकी...
...दिल पे कई बोझ है ,..और बोझिल शाम है बाकी ...
..................तू भी अपनी बात कर ,... दर्द छेड़ ..ज़रा तौल कर तो  देखूं.....
..................की मिट गयी मोहब्बत इस दुनिया से ....या कोई हीर अभी भी है बांकी.....
..................................
..................................

...ज़रा शीशा तो उठा ,...दो जाम बना ले- ऐ साकी.....
...दिल पे कई बोझ है ,..और बोझिल शाम है बाकी ...





Sunday, 24 March 2013

मेरे क़ैद ज़ज्बात

अर्र्ज़ है ......
..........
वो यूँ नज़्म लिखता रहा ......
मेरे कब्र की आगोश में .......
.....................उसके आँसूं -ए  स्याह से .....
.....................मेरी प्यास बुझती रही ........
................................
................................
वो यूँ नज़्म लिखता रहा ......
मेरे कब्र की आगोश में .......
............
मेरी ये ख्वाहिश है कि ...अपने इस कलाम में कुछ और शब्द जोड़ पाऊँ ...

Thursday, 21 March 2013

"क्यों"

अर्र्ज़ है......
.......
...थमता नहीं है मन्ज़र....
...तेरी यादों का सपनों मे ...
...फिर नाम क्यूँ मिट जाता है तेरा.....
...जब लिखता हूँ अपनों में....
.............................
...कि अब  बहूत दूर चले आये...
...मौसमों का रंग भी पड़ गया है फीका...
...शायद अब वो मौज़ बीत गयी.....
...जब धड़कता था तू दिल बन कर
...धडकनों में ......
.............................

...थमता नहीं है मन्ज़र....
...तेरी यादों का सपनों मे ...
...फिर नाम क्यूँ मिट जाता है तेरा.....
...जब लिखता हूँ अपनों में....


 










"मेरी प्रथम कोशिश "

अर्र्ज़ है........

......दे दर्द ....
..... ऐ वफ़ा बेइन्तेहान इतना ....
......कि दर्द में ही सुकून मिले .......
......को गर ....
......मुझे नहीं तो, मेरे राख को ही सही …
......तेरी मुहब्बत नसीब हो ......
......वो ज़ज्बात वो जुनूं मिले ......
....................
......दे दर्द ....
......ऐ वफ़ा बेइन्तेहान इतना ....
......कि दर्द में ही सुकून मिले .......