Monday, 25 March 2013

काश" ( कभी यूं भी तो हो )

इक लम्बे इंतज़ार के बाद… 

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कभी कभी ज़िन्दगी में, वो मोड़ भी आता है…
जब दर्द ही मरहम बन जाए .....
...उस पल में टूटे दिलों में, ये ख़याल जरूर आता है कि… 
.......अब ज़िन्दगी संवर जाए भी तो क्या ...
.......जो दर्द हद है….वो गुज़र जाए भी तो क्या ......
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ऐसे ही अनछूए पलों को कुरेदती हुयी नज़्म ..
अर्र्ज़ है…. 
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सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो……. 
कि ...
जिसके दीदार से छुपते रहे, ता-उम्र .....
अब उससे मुलाक़ात हो तो क्या हो......
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सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
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कि ...
धूप बनकर जो चुभती रही, उजालों में ....
उसके घने गेसुओं के साए में,
इक रात हो तो क्या हो...................
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सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
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कि .....
मेरी प्यास, जिसे "मृगतृष्णा" का साथ रहा हमेंशा.......("मृगतृष्णा": Mirage)
आज डूब भी जाऊं ,
प्यार के बरसात में, तो क्या हो......
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सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
.........
कि......
हाँ ज़िन्दगी, आसां होती ....
फूलों के सेज़ पर, जवां होती ......


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हाँ ज़िन्दगी, आसां होती ....
फूलों के सेज़ पर, जवां होती ......
........
लेकिन इक शायर.....
को दर्द का साथ ना हो, तो क्या हो ......
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सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
















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