Tuesday, 31 December 2013

" मैं " (The Frustrations.....Past !!!! Present !!!! Future)

कभी कभी एक चेतना .......  ज़िन्दगी के कुछ आयाम ……
जिसे हम "महत्वकाँक्षा" "अपेक्षाएं" ……
के नाम से जानते हैं ....
किसी मोड़ पर आप अपने आप को … ठगा .… व्याकुल महसूस करते हैं ....
जब आपकी "सच्चाई" आपके "अस्तित्व" से मात खा जाती है … 
…………… 
और यही व्याकुलता ……………
जन्म् देती है आपके अंतर-आत्मा के आवाज़ को .... 
नयी चेतना का आभास होता है 
ऐसा लगता है किसी ने .... 
रूह को झंझोड़ दिया हो जैसे …… 
………………………
मेरी कविता उन व्याकुल पलों में .......... 
नव-आकार  लेती हुयी सृजनात्मक कोशिश हैं .... 
…………………………
…………………………
मैं वो नहीं जो आज हूँ .......
दम तोड़ती… धीमी आवाज़ हूँ .......
बिखड़ा पड़ा हूँ कोने में .......
किसी आंधी के गुजरने पर .......
बेकशीष  ग़ज़ल का .......
बेसुरा साज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
…………
.............
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
डरा सहमा सा .......
बुझते लौ कि .......
साँसों के हिसाब जैसा .......
डूबते सूरज कि .......
रात के हिजाब जैसा .......
बेमियादी … बे-मुरब्बत नमाज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
…………………
…………………
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
जो किसी का जुस्त-जू न हो
वो दवा
जो दर्द का सूकून  न हो
वो ख्वाब
जो आरज़ू न हो
वो शख्श
जिसका वज़ू  न हो
जो खुद से हो शर्मिंदा, वो लाज़  हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
……………
……………
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
दर्द हूँ दिल का .......
चिपटा हुआ नासूर हूँ .......
सुर और प्यालों में गिरफ्त .......
कोई बेसुध मगरूर हूँ .......
मौत कि और धकेलती .......
वो मर्ज़ ....  वो सुरूर हूँ .......
खुद पे बोझ .......
खुद से दूर हूँ .......
जिसका कोई अंज़ाम न हो … वो आग़ाज़ हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
...................
...................
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
धड़कते लौ कि बात तो छोड़ो.......
मृत.……विहीन राख़ हूँ…
बे-क़दर … बेनाम साख हूँ …
खोटे सिक्के भी चिढ़ाये जिसे 
वो बिखड़ा पड़ा .... लाख हूँ 
वो अछूत … अनचाहा परवाज़ हूँ
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
……………
……………
किसी दिल का धड़कन .......
या तमन्ना किसी का .......
किसी का बेरंग ख़वाब .......
तो किसी  का बेमानी महफ़िल .......
किसी कि  बे-मुराद मोहब्बत .......
तो… किसी के नफरत का पैमाना .......
किसी कि चोट .......
किसी के दिल का गुबार .......
रेत  पर मौत बांटती "मिराज़" हूँ .......
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
मैं वो नहीं जो आज हूँ 
………………
………………
कुछ लम्हों में मेरा कल खो गया हो जैसे 
एक ज़िंदा दिल……खुद में खुदा  सो गया हो जैसे  
…………………
…………………
मैं आह था ……  चाह था .......
भीड़ में एक वाह था .......
आसमान को छूता था.…… मैं अपनी मर्ज़ी से .......
बेफिक्र … था प्रबल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था ....... 
……………
.................
मैं क्यों नहीं जो कल था 
प्रखर…तेज़ मेरे माथे पर .......
तारों को तोड़ रखता था सिरहाने में .......
खुद में अखंड था …… अचल था ....... 
मैं क्यों नहीं जो कल था 
……………
.................
मैं क्यों नहीं जो कल था 
अद्वितीय …… असाधारण
अदभुत … अलौकिक
अतुलनीय …… अविस्मरणीय
असंख्य ....... अमौलिक
आमोद … अविरल था
मैं क्यों नहीं जो कल था 
………………
.....................
मैं क्यों नहीं जो कल था 
शिव सा सुरीला साज़ था .......
खुदाया बन्दा ए-परवाज़ था .......
सिंह के गर्ज़ना सा आवाज़ था .......
खुदा का नूर…… खुदाया का नाज़ था .......
दुनिया थी मेरे लिए .......
सब कहते थी कि अव्वल था .......
मैं क्यों नहीं जो कल था मैं क्यों नहीं जो कल था 
.............
………...
आज कल के चीड़ में 
आगे निकलती इस भीड़ में 
कल से नयी शुरुआत हो 
जो दोस्त हैं वो साथ हो 
जो थे नहीं वो छुट गए 
मेरे साथ मुझको लूट गए 
.............. 
………… 
अब एक और खेलनी बारी है 
इस बार ज़ोर कि तैयारी है 
जो मैं जीतूं सब साथ रहे 
क्यों आज कल कि बात कहें 
है ढेर उम्र मुंह तकता हुआ 
मेरे आज कल को ठगता हुआ 
................
................
यह मुर्ख  द्वन्द  सब छलना है 
मेरे सूरज  को कहाँ अब ढलना है 
है तेज़ भरा…अविजित खड़ा 
………….
................
जो सफल होगा वो आज पड़ा 
जो सफल होगा वो आज पड़ा 


Sunday, 17 November 2013

सचिन …… सचिन ......


एक शानदार व्यक्तित्व ……
एक अविस्मर्णीय करियर .......
एक प्रेरणादायी जीवन ……
भारत रत्न श्री सचिन रमेश तेंदुलकर ……
को समर्पित ……
..................x ................... 

ये सोच कर.....  
कि तुम्हे… कतार में.… 
कल ढूढेंगी निगाहें…
…………  
ना पहले जैसी…
बात होगी 
ना जोश होगा…… 
ना तालियों में दम.…… 
करतल ध्वनि भी होगी .... मध्यम…… 
…… 
ना हारने का डर.…… 
ना जीतने का स्वर…
शायद वो समय चल पड़ेगा 
जो जाता था ठहर.…
……
ना कोई सवाल होगा....... 
ना कोई बवाल होगा……  
दिल को जल्द ही मना लेंगे…… 
कि अब फिर से 
ना कोई कमाल  होगा…… 
……… 
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
....... 
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
…… 
दुश्मनों कि 
तेज़ तलवारें तो होंगी 
पर तुम सा.…… 
ना ढाल होगा…
………… 
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
……… 
सोने से भारत के 
स्वर्णिम उपलभ्दियों....... 
का शायद…
अब न कोई साल होगा…… 
..........
तुम न लौटने वाले 
बस ये ख्याल होगा 
…….......  
ना शिक़वा……
ना शिकायत होगी.......... 
सीधे प्रसारण कि भी 
ना अब कोई चाहत होगी……
………… 
कि अब भी कोई 
जूझ रहा अकेले 
ऐसी भी न राहत होगी……… 
…….... 
ना अब इक ही जगह……
पाऊँ टिकाने.......  
कि जरूरत होगी 
ना ही....... इक टीवी से चिपके……
सौ सूरत होगी………
....... 
न भूखे रहने कि 
गुज़ारिश…… 
न प्यासे रहने कि 
ख़वाहिश....... 
....... 
ना साँसों पे अंकुश……
ना बोलने की  मनाही....... 
ना सुनसान सड़के
ना खाली कढ़ाही 
…… 
ना झूमता घर होगा … 
ना कोई परिवार होगा......
अब न सप्ताह का हर दिन…
जैसे रविवार होगा 
...........  
सब ज्यों का त्यों है……
बस इतनी सी कमी खलेगी….... 
…… 
आज सोलह नवंबर
दो हज़ार तेरह से 
कि अब न मेरा भगवान्, मेरा ख़ुदा  
खेलने वाला…
क्रिकेट मैच तो……
कई बार होगा 
कई बार होगा 

Tuesday, 29 October 2013

"बिखरे ख्याल…कुरेद्ते ग़ुबार"

मेरे मन में …मेरे शेरो-शायरी का वो भी जख़ीरा है… 
…जो  खुद -बा-खुद  ……… लब्ज़ों में बयां हो जाते हैं  ……
.......... जब मन बोझिल हो जाता है  …… 
………जब हृदय स्थिर…… 
और आत्मा बैचेन हो उठती है ………… 
................ 
वैसे ही कुछ ख्यालों को …… गुबारों को समेटने कि कोशिश कर रहा हूँ  …… 
………
............
अर्र्ज़ है 
………… 
१.
.… कई सालों से ……
… कोई दस्तक दे कर …
… मेरे ज़ख्मों को कुरेद जाता है .... 
…… 
…और पूछता हूँ जो सबब ....... 
… तो बस ये आवाज़ आती है .... 
…………… 
कि तेरे हरे ज़ख्मों, से जो कराह आती है  …
… तेरी याद बन कर…… 
.... सुकून से उन लम्हों में  …
.... चैन से सो लेता  हूँ …
……… 
बांकी पल …
ये खुदाया का कुफ्र …है कि  …
………
तेरी याद में रो लेता हूँ .... 
………
कि तेरे हरे ज़ख्मों, से जो कराह आती है  …
… तेरी याद बन कर……
.... सुकून से उन लम्हों में  …
.... चैन से सो लेता  हूँ …
…………………x ………………
…………………x ………………
२.
… तेर हर अर्र्ज़ को .... 
.... मैं अपना फ़र्ज़ समझ …
.... क़बूल किया …
.......... 
… तेर हर अर्र्ज़ को ....
.... मैं अपना फ़र्ज़ समझ …
.... क़बूल किया …
..........
… कि.…
शायद एक खुदा के रहते.......
किसी और को ख़ुदा बनाने का…
मैंने भूल किया  ……
..........
… तेर हर अर्र्ज़ को ....
.... मैं अपना फ़र्ज़ समझ …
.... क़बूल किया …
…………………x ………………
…………………x ………………
३.
खुदा  भी जिसके नूर से .......
हैरान था…
परेशान था ....
ख़ामोश रहा…
.............
.............
मैं वो बन्दा हूँ  …
जिसने तेरी नियत टटोली…
और बे-पर्दा किया ……
…………………x ………………
…………………x ………………
४.
मेरे इक ज़िक्र से ही.……
तेरे चेहरे पर.…
ज़ो .... आ जाती  रौनक़ ....
…………
ये इशारा है …
इस महफ़िल को ....
कि.…
कोई दर्द छिपा रखा है....
………………
कि बेवफा का ही लिबास ओढ़े रखना ……
जब पत्थर उछले जाए मेरी तरफ़  .......

कि इक आंसूं भी बहा …
तो बयां हो जायेगी……
खुद -बा -खुद  ……
………
तेरे छलकते काज़ल से ही सही ....
……
वो
.... बे-इन्तहां  मुहब्बत ……
जो तूने दिल में दबा रखा है  ……
..........
कोई दर्द छिपा रखा है....
…………………x ………………
…………………x ………………
५.
……है कुचलने  को अमादा ……
… एक इंसान यहाँ ....
... दूसरे  इंसान को ....
अपने पैरों तले .......
………
……है कुचलने  को अमादा ……
… एक इंसान यहाँ ....
... दूसरे  इंसान को ....
अपने पैरों तले .......
……
सबब पूछो  ……
तो बड़ी तबियत से कहते हैं कि …
………
वो रोटी बड़ी बेस्वादी सी लगती है  …
जिस पर  किसी गैर का, नाम न लिखा हो ……
…………
रूह कि प्यास बुझती  ही नहीं .......
जब तक……
लहू न मिलायी जाए ……
………
……है कुचलने  को अमादा ……
… एक इंसान यहाँ ....
... दूसरे  इंसान को ....
अपने पैरों तले .......
…………………x ………………
…………………x ………………
६.
… हो तेरे  ख्वाहिशों …
में वज़न इतना …
..........
कि जिन रास्तों से ……
तू भटक भी जाए ……
…………
वो मंज़िल-ए -पाक हो कायनात की …
वो मंज़िल-ए -पाक हो कायनात की …






Tuesday, 22 October 2013

"धुंद " ( श्री जगजीत सिंह को समर्पित )

 …ये ग़ज़ल… मैं " ग़ज़ल सम्राट " श्री जगजीत सिंह को समर्पित करता हूँ …
…… जिनके रेशमी आवाज़…………
…… इक अलग ही अंदाज़े-बयां  …….
… और रूह को भी झकझोर कर रख देने वाला…… शब्दों का तर्क़श  ……
के मेरे ज़िन्दगी में एक ख़ास आयाम है  …. महत्व है …
………
 उन भावनाओं को  पीड़ोना, उसे सार्थक करना……. किसी  महासागर के प्यास को….  दो बूँद …
पानी से बुझाने के समान  है  …………
…………………….
......Like millions...Praying hearts and Souls....I firmly believe....
......The Immortal voice of Jagjit Saahab will.....rise again..to support this dying..complex...sophisticated world....with
...reaps of Love, Humanity....and an ample reason to live.

Let the legend....graced with thousands of years..of soulful divine melodies...
....Let the tribute begin......
…………
………… 
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
प्यार में गुज़रे हुये … कई साल छुपा रखा है ….
… दिल के कोने में …… 
………………. 
…. तेरी कसमों का झुरमुट, तेरे वादों का हिसाब ….
…. तेरी कसमों का झुरमुट, तेरे वादों का हिसाब ….
…… दुनिया से छुप-के, पहुंचाये हुए …. खतों का ज़वाब ….
…… दुनिया से छुप-के, पहुंचाये हुए …. खतों का ज़वाब ….
…  अब भी लिखता हूँ तेरी याद में …. गैरों के लिए ….
…  कोई वज़ह तो होगी बे-वफाई की …. ये ख्याल छुपा रखा है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
…………
मुझको सब जानने लगे, हो गया सब से क़रीब ……. 
इक तुझे छोड़ के सही …. हर इंसान मेरा रक़िब …
क्यों बना न सका तुझे  अपना ……सवाल खुद से छुपा रखा  है …. 
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
…………. 
तुझ से मिलने  का…… बिछुड़ने का ग़म मुझे ही क्यों मिला …
तेरी यादों का … तेरे इरादों का तोहफ़ा मुझे ही क्यों मिला …. 
तेरी अदाओं पर मेरा मरना …. दिल के चोटों का निशां  …. मुझे ही क्यों मिला … 
…………… 
…………… 
खुदाया…. किसी और दीवाने को तेर लिए बनाया होता … 
ये मलाल … छुपा रखा है  …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …
… दिल के कोने में, तेरा हाल छुपा रखा  है …



Wednesday, 21 August 2013

"Dreams Of Change"......मेरी कोशिश

The poem...and feelings...presented..is my first...venture into....the world of Passion, Revolutions....Rebellions.....and frustrations against this dying world...

…………
ये मेरी पहली सार्थक कोशिश है…. जहाँ मैं अपने भावनाओं की पीड़ा और सुख से दूर… कुछ  "ओज्पुर्र्ण " लिखूँ …… 
…… जहाँ मेरे शब्द इस बदलाव के माहौल की चिंगारी …. को थोड़ी हवा दे सके…. 
…… जहाँ मेरी कोशिश बंद पड़े उजले महलों की रौशनी को "सूर्य " का तेज़ दिखा सके…
………… 
The last ...paragraph...of the poem totally deviates from the original theme....
जहाँ मेरा डर  … मेरी कोशिश  को ज़ार ज़ार  कर देता है  …
............... 
And those lines turns to satire....
......I hope my faith will be appreciated .....

...............................................
कई लोग फितरत बदल कर,
नियत बदल … 
सितारों को ढून्ढ लाते हैं  …. 
…… पर जब वो लौट  आते हैं … 
तो बंद मुट्ठी में राख पाते हैं … 
क्योंकि 
ये वो सितारे हैं  …. 
जो खुद अपनी ही आसमान को बेच खाते हैं … 
……. 
टूटी नियत को हमेशा  …. 
टूटे सितारे ही हाथ आते हैं  …. 
बंद मुट्ठी में राख पाते हैं … 
……. 
पर अब भी एक सितारा चमक रहा है वहां  …. 
अडिग, अविरल, निश्चल अपनी तेज़ से … 
……. जो लड़ता रहा बुरी फितरतों से बड़ी देर तक  …. 
चीटीं सा था वो …पर कुछ बात तो थी … 
की भीड़ चुका  था  …
भेडियों से …. और शेर तक …. 
पर है उम्मीद अब भी  …
की जब मैं उसे लाने जाऊँगा  …. 
लौटूंगा कुछ ले कर  … ठोस नव-निर्माण को ही  …. 
ख़ाक हो जाऊँगा सही  …. 
पर राख ले कर न आऊँगा  …
……… 
क्या फ़िक्क्र की जो मेरा, सितारा होगा  … 
वो लाख में इक का ही प्यारा  होगा,
………….
थोड़ी मध्हिम होगी उसकी चमक … सच है …
पर रोशिनी होगी ज़ोर  की …
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
…………
तलाशनी है काग़ज़ी, महलों को छोड़ ….
एक नए "अडिग" ठौर की …. 
एक उदयमान नए भोर की  ….
की सिस्कारियों और फुसफुसाहटों, का वक़्त नहीं  ….
एक स्वछंद "गर्जना" सी शोर की  ….
सब को पीरो, कर जो रख सके  …
वो बिना छोर के डोर की  ……
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
की सारी  गंदगी सिमट चुकी  ….
की पहुँच चुके "हिम" की छोटी से विसर्जन को  …
कोई बात नहीं  ….
की अब तक था साथ नहीं ….
………….
मैंने भी तो खुद को बंद कर लिया था …
अपने ही बनाए अंधेरों में  …
कहता था  ….
मैं क्यों  ….
जब मुझे कोई आघात नहीं  …
………….
अब "मै-तू" की बात नहीं   …
वक़्त है "हम" से होने वाले शोर की  …
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
हिम की छोटी से विसर्जित करे  …
अपनी मैली मिटटी को आज " गंगा"  में  ….
की वक़्त आ गया है  ….
हर " इंसान" या "आदमी" ही सही  …
के दिल से निकली एक "जोर" की  …
……………
भय, लालच, द्वेष और घृणा से दूर … 
अब बात होगी नए दौर की … 
……………
……………
थक गया हूँ  … 
हर रोज़ एक ही सपने से  …. 
क्षण-भंगुर  अपनों से  …. 
…………. 
और वही लाचारी अगले भोर की  …. 
हलक में ही दम तोड़ती शोर की  ……… 
खुद को ही  …दफ़न करने को अमादा …. 
मन में छुपे उस चोर की  …. 
……… 
की शायद थम गया है  …. 
मेरी व्याकुलता के सिरहाने  …
बात नव-निर्मित … नए दौर की ….  
……………. 
थक गया हूँ  …
आम आदमी और ख़ास के अस्तित्व की जंग से  …. 
हर रोज़  "भारत" को शब्दों से बदलने वाले …. 
कवियों के रंग से  …
…………
…………. 
थोड़ा घबरा सा गया हूँ  ……… 
उसी बंद कमरे में  … 
फिर अपने घर आ गया हूँ मैं  ……
…………
उसी बंद कमरे में  … 
फिर अपने घर आ गया हूँ मैं  ……

Wednesday, 24 July 2013

"COMEBACK"

........THIS POEM IS DEDICATED TO OUR BELOVED ONE'S.....WHO GRACEFULLY.....EMBRACED THE WORDS....."TILL DEATH DO US APART"

………………………. 
इस जहां में… "मृत्यु" से बड़ी कोई सच्चाई नहीं …
… और जिंदगी में किसी मोड़ पर …. ये ख़याल …. 
कि इस पल के बाद सारी जीवित बातें …. किसी ख़ास के जाने के बाद …
……… यादों में तब्दील हो जाएगा …
… ये अद्वित्यीय … असाधारण …. तकलीफ़ है ………… 
…………… 
पर जैसे किसी ने ख़ूब कही है…. 
" वक़्त हर घाव को भर देता है … 
 और शायद इसी … कथन से प्रभावित हो कर ज़िन्दगी की साँसे कभी ………
…………. मौत जैसे ठोस सच्चाई के सामने भी दम नहीं तोड़ती …… 
…….....
मुझे अपने पढ़ने वालों …से उम्मीद है की …. 
…. शायद मेरे शब्द …. मेरे अलफ़ाज़ … आपको आपके अतीत में ले जाए …. 
… भूली बिसरी यादों के बीच ….जो कचोटती तो जरूर होंगी …. लेकिन जिनका एक मीठा अहसास भी जरूर होगा … 
..............
Hope.....My words evoke your past...your beautiful...sharings with beautiful people...
.....resting their Soul with Almighty.

....My poem is my respect to all those lovely "Remeberings" and those lovely ones's.....
............................X...........................
............................X...........................
… ना जाने क्यों …
 …. वो आँखें मूँद जाती है …
…. वो पलकें रूठ जाती है …. 
…………
जिन की रोशिनी में आप ……. 
देखना सीखते हो …. 
जिसके छावं तले …. 
आप स्वप्निल संसार में … 
क़दम रखते हैं …. 
………
जो ओझल हो जाए … 
क्षण के लिए भी अगर … 
मन बैचेन सा हो जाता था … 
छोटी … ना-समझ … डरी आँखें … 
बूढ़ी, प्यारी आँखों को …
टटोलने लगती थी …. 
……… 
और हर बार की तरह … 
वो आँखें लौट आती थी … 
मेरे व्याकुलता को स्पर्श करने के लिए … 
लेकि आज तो सिर्फ इंतज़ार है …उन आँखों का … 
पर कोई दस्तक नहीं …कोई हरक़त नहीं … 
यही कहीं …. शायद अब कभी नहीं …
…………
ना जाने क्यों …. 
उन उँगलियों में कोई थिरकन नहीं …. 
व़े हाथ स्थिर … बेज़ान पड़े हुए हैं ………. 
…………. 
कि  जिन उँगलियों को थाम ….
मैं सूरज को छुने निकल जाता था … 
की वही बूढी … अब मृत उंगलियाँ … 
जब तक मेरी रोटियों को तोड़ न ले … 
मैं निवाला खाता नहीं था …. 
याद है मुझे …. 
.......
की अभी भी अहसास है मुझे … 
उन ठोस उँगलियों का … मेरे गालों पर … 
और है यकीं अब भी… 
की तब भी… 
तकलीफ़ बंटती थी दोनों तरफ़ …. 
…… 
आज फिर से भूखा हूँ उन निवालों  का … 
थोड़ी प्यास भी लगी है … 
एक झुरमुट सा बन चुका है मेरे सवालों का … 
…. 
पर कोई हरक़त नहीं होती …
अब उन उँगलियों में …. 
की शायद मेरे गालों के चोट से … 
सुन्न सा पड़ गया है वो …. 
है फिर इंतज़ार मेरे दर्द को 
उन थपकियों की तमन्ना …. 
कोई थाम ले … 
मेरी कांपती उँगलियों को आ के … 
……….
पर कोई दस्तक नहीं …कोई हरक़त नहीं … 
यही कहीं …. शायद अब कभी नहीं …
……
ना जाने क्यों वो अमर्त्य शरीर … 
ठंडा पड़ गया है …. 
की सभी को थाम कर रखने वाला मेरा भगवान …. 
खुद मौत से ही डर गया है … 
…… 
वो लौ … 
क्यों बुझ गयी … 
जो खुद एक नूर था … 
क्यों खुद वहां जाने की ज़िद कर बैठा … 
जब रखता मुझको दूर था … 
………. 
अब कौन मुझको गोद लेगा … 
अब कौन थामेगा मुझे … 
कौन रातों को जागेगा … 
जब नींद न आएगी मुझे … 
…. 
अब कौन मेरी …
बिमार काया को ताप देगा … 
जब खुद का शरीर … 
ठंडा पर चुका … 
है ये भी अब तय की … 
अब वो लौट कर ना आने  वाला … 
की शायद अब वो मर चुका …. 
…………. 
पर चौंकता है ये खुद- गर्ज़ मन अब भी … 
है गुज़ारिश … 
की एक दिव्य झोंका सा आये … 
की त्रिलोक को भी ठग कर …. 
कहीं से एक धोंखा यूँ आये 
……… 
की उन बूढी उँगलियों में … 
वो थिरकन लौट जाए … 
जिसके लिए धड़कता था दिल मेरा …
वो धड़कन फिर से लौट आये ….
…………
घर के कोने में …. 
किसी काले  कमरे में … 
कई घंटों से … 
कुछ ऐसे ही फ़िज़ूल … 
असंभव ख्यालों में खोया हुआ हूँ मैं …. 
… इंतज़ार है किसी का …. 
या कोई खबर ही सही … 
………
पर कोई दस्तक नहीं …कोई हरक़त नहीं … 
यही कहीं …. शायद अब कभी नहीं …
……
की शायद अब तो …
सब लौट आये हैं … 
किसी को दफ़न कर के … 
छट रहा है … 
मेरे लगाव का अँधेरा ……
हो रहा हूँ ….  तैयार कल के लिए … 
कई काम है बांकी …. 
उस नाम का वजूद है बांकी … 
……. 
की कोई शायद चिढ़ाता है मुझे ….
की कई …. और भी चोट है …. 
भगवान् के मन में …. कई और खोट है … 
ये तो तेरी परिक्षा की …. 
पहली झांकी है … 
तू जिनके बिना …. 
न जीने की क़सम खाता था …. 
कई और बांकी है …. 
कई और बांकी है …. 
………
तुम झूठे … या फिर वो क़सम झूठे …. 
तुम झूठे … या फिर वो क़सम झूठे …. 
तुम झूठे … या फिर वो क़सम झूठे …. 

Monday, 8 July 2013

" माँ "

This is my sorry, my regret......in fact its a sorry from every child of this world.....to his/her beloved Mother...for whatever arrogance...they have shown.....or said....


Just go to your flash back.....your teenage period.....
....when your adrenaline pumped..more than what is required...
....when right seems wrong...and wrong seems perfect....
....when...your choices...and your opinions with your family...never matches...
....when you were "Revolutionary" for outsiders.....and even bigger one for the insiders...
....................................................

....................................................
अपने जिंदगी के ...कुछ वाक्यों से… कुछ अपने बचपन की यादों को टटोल कर ...
मैं कोशिश कर रहा हूँ की ....इन्हें कुछ शब्दों में पीड़ो  सकूँ ....
मैं जानता हूँ की ...ये असम्भव सी चुनौती है… क्योंकि .....
कविता का शीर्षक ...ही मूल रूप से इतना विशाल है ... की ...
उसे चंद  शब्दों में पिड़ोना   .......
अतिश्योक्ति ही लगता है…
..........................
मुझे ऐसा लगता है की ....मेरी इस रचना में ....इस संसार के प्रत्येक व्यक्ति विशेष (स्त्री ...पुरुष  दोनों ) के जीवन के घटनाओं को जोड़ा जा सकता है…. इस पवित्र  शीर्षक में समावेश किया जा सकता है….
अगर इस कविता में ...पढने  वालों, सुनने वालों की भावनाओं ... उनकी कहानियों ...से आगे बढ़ाया जाए तो शायद .....
................मेरी ये कविता सम्पूर्ण हो सके…. सार्थक हो सके ....
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मेरी "माँफी" अर्र्ज़ है ......
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हाँ मेरी माँ ही तो थी वो ...
पेट में असहाय दर्द ...
मन में एक सजीव ख़ुशी ...
और पलों में पूर्ण होने का अभिमान ....
हाँ ये जन्म है मेरा ...
हाँ ये जन्म है मेरा ...
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एक बात तो ये भी सच है की ...
मेरे भगवान् को भी मिले दूसरा पायदान ....
क्योंकि मेरी मान सर्वश्रेष्ठ है…शीर्ष  है ....
न उनके जैसा कोई और समान .......
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की अब नन्हा हो चूका हूँ मैं ...
कोई मुझमें राम देखता है ...
कोई कृष्ण ढूँढता है .....
पर मेरी माँ को ही न जाने क्यों ...
मेरे खुरदरे शरीर पर भी ...
कोई अनजान उंगलिया भाता ही नहीं ...
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की रूखा-सूखा ही सही .....
माँ ..के निवालों को छोडकर ...और कुछ मैं खाता ही नहीं ....
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की शायद अब बड़ा हो गया हूँ मैं ...
माँ की पुड़ी-खीर को छोडकर ...
हज़ार नहीं, लाख़ बार ही सही ...
अपनी माँ के दिल को तोडकर ....
प्लास्टिक में बंद चीज़ों को खाने लगा हूँ मैं ...
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मगर ये कैसा बदलाव है ..
मेरे अंतर-मन में ...
माँ के मशवरों के पीठ पीछे ....
उनकी हर बातों के खिलाफ ...
दबे होठों से कुछ ...मन में विरोध लिए ...
अपनी माँ के तेज़ को छोड़कर ...
बंद कमरों के अंधेरों में ..
उल-जलूल बड़-बडाने लगा हूँ मैं ....
अपनी माँ के दिल को तोड़कर .....
प्लास्टिक में बंद चीज़ों को खाने लगा हूँ मैं ...
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की इस झूठे घमंड को साथ लिए ....
की अब मेरा भी वजूद है ...
खुद ब-खुद ...खुद को ही ...
समझाने लगा हूँ मैं ....
अपनी माँ के दिल को तोड़कर .....
प्लास्टिक में बंद चीज़ों को खाने लगा हूँ मैं ...
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की अब ऐसा लगता है कि…
जिसके खोख से नौ-महीने तक चिपका रहा ...
उसी माँ से ...प्यारी माँ से ....
बहुत  दूर, कहीं दूर जाने लगा हूँ मैं ....
की शायद बड़ा  हो गया हूँ मैं ...
मेरी माँ ...मेरे दोस्त भी ..यही कहने लगे हैं ...
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की शायद अभ बड़ा हो गया हूँ मैं ...
और  मेरी माँ छोटी …. उनकी सोच छोटी ....
की अब मेरा सिक्का चल गया है ...
और मेरी माँ खोटी ....
की अब कुछ "जनरेशन" गैप सा आ गया है ...
मुझ में और मेरी माँ के दरमियान ....
मेरी माँ वही स्थिर ज़मीं हैं ...
और मैं फैलता आसमान ....
की मुझ में सारा  ब्रह्माण्ड है ...
और वो एक सूक्ष्म सा निशां ...
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"खेद " (Sorry) की अभिव्यक्ति ......
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कई "थ्योरिस" (Theories) मैंने पढ़े ...
कई जीवों से पूछा ...
कई लेक्चर मैंने सुने ....
कहीं से न कोई, जवाब न मिल सका ....
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पर एक बात पर सब "पैठ" थे की ...
औलाद ठ्कते (Cheat) हैं सही ...
बदलते हैं खाता और बही ...
पर किसी अपनी  माँ ने भी ...
किसी सौतेले को भी ठका  नहीं ...
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औलाद ठ्कते (Cheat) हैं सही ...
बदलते हैं खाता और बही ...
..................
लाख अफ़साने मिले  ... और लाख माफियाँ मिली ....
पर मैं तो अपने में इस क़दर चूर था .....
माँ की बातों, को गलत साबित करने में मगरूर था ...
बात बंद थी ...मूर्ख द्वन्द थी ....
सच था मैं ... और माँ झूठी ....
सही था मैं और माँ टूटी ....
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न जाने कौन सा नशा छाया रहता था ...इस क़दर ...
माँ के आँचल की जन्नत को छोडकर ...
भटकता रहता था दर-बदर ...
ओंठों पे झूठी मुस्कान लिए ....
और मन में मचा रहता था ग़दर ...
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रोटी छूटी ...."छोटी" छूटी ....
किसी को गलत साबित करने के लिये….
अंतर-कलह से प्रण लिए ...
हैं तो अब भी वो हाल वही ...
जो सालों पीछे छोड़ आया ...
मृत-सेज पर लेटा  हुआ हूँ ...
"मरणासन" है अब ये काया ..
यमदूत से बात होती है ....
कहते हैं की मैं जल्द ही आया ....
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पर ऐसा क्यों लगता है की ....
जैसे की कोई साया मुझे खीच रहा हो ...
जिन आँखों, को आंसूं मैंने दिये ...
वो अमृत बन कर, मेरी साँसों को सीच रहा हो ...
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बस एक वादा मुझसे कर रही है मेरी "माँ"..
की इतनी ताक़त तेरे शिकवों ...से मिली हैं मुझे ...
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की यमदूत हो या फिर खुद चले आये "शिव "...
कोई मुझसे पहले तेरी साँसों को भेद नहीं सकता ...
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क्योंकि वो माँ ही तो है… 
जिसने रखी हर बेटे की "नीव"....
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यमदूत हो या फिर खुद चले आये "शिव "...
यमदूत हो या फिर खुद चले आये "शिव "...

Monday, 1 July 2013

"कन्फ्यूज्ड " (मेरी पहली स्वछंद , स्वतंत्र कविता )

कुछ रोज पहले, मुझे ऐसा लगा की मानो ....मेरा प्रतिविम्ब मुझसे बातें कर रहा हो…
उन्ही बातों को कागज़ पर सिमटने की कोशिश कर रहा हूँ ......
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हर रोज़ एक सपना देखता हूँ मैं ...
हर रोज़ इक सपना बदलता है .....
हाँ ये बचपना ही तो है मेरी ...की जो पूरा न हो सका तो ..
हर वो सपना मुझे खलता है ....
हर रोज़ मेरा इक सपना बदलता है .....
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हर शाम क्षितिज़ पर पहुँच कर ...
ऐसा लगता है की मैं सीढ़ी ही भूल आया ...
डर  लगता है की जैसे… शायद फूलों के बदले
हाथों में सिर्फ शूल आया ....
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या फिर ऐसा लगे ...
की जो इस मोड़ पर खड़ा है ....वो केवल परछाई है मेरी .....
खुद को तो बहुत पीछे ही कहीं ...खुद को मैं भूल आया ...
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आँखें बड़ी है इतनी ...
की संसार समा  लेता हूँ ..
दिल बड़ा है इतना ...
की जरूरत हो किसी को मेरी ...
तो खुद को थमा देता हूँ ...
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फिर न जाने क्यों एक ...सूनापन  सा महसूस होता है…
दबे सिसकारियों ...और मुस्कराते ओंठों के तले ....
अकेले में ये दिल रोता है ....
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न जाने क्यों …कि जग जीतने का घमंड रख कर ...
सब कुछ गवाए बैठा हूँ ....
टूट चूका हूँ .... लूट चूका हूँ ....
फिर भी न जाने क्यों ऐंठा हूँ ....
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न जाने कितनी बातें चलते रहते है ....मेरे उलझे हुए "सर" में ...
सच कहूं तो ऐसा लगता है .....की मिल  गये जवाब सारे ....
इस पुडिये वाली ज़हर में ...
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पर लिखने वाले ये तो भूल ही गए ....मैं रोबोट नहीं आदमी हूँ
की बिखर जाऊं ये मंजूर है सही ....
लेकिन लड़ना तो मेरी फितरत में है ...
अभी तो एक चौथाही ही बीती है ...वक़्त अभी मेरे मुट्ठी में है ....
बदलूँगा मैं भी …ये वक़्त भी …मेरे बारे में सोचने वाले भी ....
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अपनी जीत पर भी मैं ...खुद की कलम चलाऊंगा ....
आज मेरे हार की सुन लो…कल लौट के फिर आऊँगा 
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कल लौट के फिर मैं आऊँगा .............





Thursday, 27 June 2013

"मेरी पहली ग़ज़ल "

गाइये, गुनगुनाइए, मुस्कुराइये .....
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हर रोज़ चले आते हो, अफसानों  में हमारे ...
ढूँढू तुम्हे मैं कैसे ....वीरानों में हमारे .....
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हर रोज़ चले आते हो, अफसानों  में हमारे ...
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कहते हो कि चाहा नहीं .....चाहत से कभी तुमको ..
ख़ुद नाम लिया फिरते हो ....अंजानो में हमारे ......
....................
हर रोज़ चले आते हो, अफसानों  में हमारे ...
....................
सब कुछ लुटाया तुम पे ...हर पल तुम्ही को पूजा ....
अब नाम दे दो अपना ...दीवानों में हमारे .....
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हर रोज़ चले आते हो, अफसानों  में हमारे ...
ढूँढू तुम्हे मैं कैसे ....वीरानों में हमारे .....
....................











Sunday, 23 June 2013

" ख़याल "

अर्र्ज़ है ....

१. तेरी तन्हाइयों से फीकी है….
    मेरी शामें इस क़दर ......
   ..............सागरों जाम डूबा हूँ
   ..............क़दम लड्खराते ही नहीं
   तेरी तन्हाइयों से फीकी है….
   मेरी शामें इस क़दर ......

२. तेरी आँखों के नूर से .....
    रोशन हो ये जहां .....
    तेरे इरादों को जो टटोल सके…
    इस कायनात में ….
    वो दर्द ...पीड़ कहाँ ....
    ...............
    कि ....
    इसलिये  शायद, क़यामत आती नहीं
    इस दुनिया में ....
    को गर ....
    मिट गया, तेरा ही वजूद तो….
    मेरे लिए
    ये जहाँ कहाँ ......
    दिल में ख़ुदा कहाँ ...
३. 

Thursday, 28 March 2013

अनछुए जज़्बात

अर्र्ज़ है ......

(१).......
किसी कि याद में डूब जाना,
मय की तौहीन है .....
.....मेरे दोस्त तू आशिक़ नहीं ...
शौकीन है…शौक़िन है .....
...................................
...................................
(२).......
......यूं  चौक इस मत दुनिया में ....
की हमने सब को बदलते देखा है ....
.....सोचा था, मय से तौबा कर लूं ...तेरे वादों पे.....
आज ख़ुद खुदा को बहकते  देखा है ...
.......
की हमनें सबको बदलते देखा है ......












Tuesday, 26 March 2013

"शराब और शवाब "

.........( मेरे मय पसंद दोस्तों के लिये ).............

अर्र्ज़ है .......
..................
क्यों लगा है इंतज़ाम -ए  मर्र्ज़ .....
दिल टूटने का .......
.................
क्यों लगा है इंतज़ाम -ए  मर्र्ज़ .....
दिल टूटने का .......
..............
कुछ और दिल लगा ले ...
.....कि अभी तेरी ...औक़ात बांकी है… 
..............
..............
...क्यों तुझे हो ग़म, दिल टूटने का .....
.....कि अभी तेरी ...औक़ात बांकी है… 
......को ग़र ....
...तू अगर पीना चाहे .....
...तो खुदा तेरा साकी है…. 
...तो खुदा तेरा साकी है…. 
................
क्यों लगा है इंतज़ाम -ए  मर्र्ज़ .....
दिल टूटने का .......









Monday, 25 March 2013

काश" ( कभी यूं भी तो हो )

इक लम्बे इंतज़ार के बाद… 

...............
कभी कभी ज़िन्दगी में, वो मोड़ भी आता है…
जब दर्द ही मरहम बन जाए .....
...उस पल में टूटे दिलों में, ये ख़याल जरूर आता है कि… 
.......अब ज़िन्दगी संवर जाए भी तो क्या ...
.......जो दर्द हद है….वो गुज़र जाए भी तो क्या ......
..................................................
ऐसे ही अनछूए पलों को कुरेदती हुयी नज़्म ..
अर्र्ज़ है…. 
.............................
.............................
सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो……. 
कि ...
जिसके दीदार से छुपते रहे, ता-उम्र .....
अब उससे मुलाक़ात हो तो क्या हो......
.........
सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
........
कि ...
धूप बनकर जो चुभती रही, उजालों में ....
उसके घने गेसुओं के साए में,
इक रात हो तो क्या हो...................
.............

सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
................
कि .....
मेरी प्यास, जिसे "मृगतृष्णा" का साथ रहा हमेंशा.......("मृगतृष्णा": Mirage)
आज डूब भी जाऊं ,
प्यार के बरसात में, तो क्या हो......
.................

सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
.........
कि......
हाँ ज़िन्दगी, आसां होती ....
फूलों के सेज़ पर, जवां होती ......


............
हाँ ज़िन्दगी, आसां होती ....
फूलों के सेज़ पर, जवां होती ......
........
लेकिन इक शायर.....
को दर्द का साथ ना हो, तो क्या हो ......
...............

सोचता हूँ ....
अब उस "वफ़ा" से बात हो, तो क्या हो…….
















शिक़्वा .......शिकायत ......

अर्र्ज़ है…
.................
....उन्हें ये ग़लतफ़हमी ....कि हम उन्हें याद नहीं करते...
....उन्हें ये ग़लतफ़हमी ....कि हम उन्हें याद नहीं करते...
.....................ये बात और है कि ....
.....................हमने हर पल जशन मनाया, उन्हें भूलने का .....

"ख्याल"


अर्ज़ है ....

..................
...ज़रा शीशा तो उठा ,...दो जाम बना ले- ऐ साकी...
...दिल पे कई बोझ है ,..और बोझिल शाम है बाकी ...
..................तू भी अपनी बात कर ,... दर्द छेड़ ..ज़रा तौल कर तो  देखूं.....
..................की मिट गयी मोहब्बत इस दुनिया से ....या कोई हीर अभी भी है बांकी.....
..................................
..................................

...ज़रा शीशा तो उठा ,...दो जाम बना ले- ऐ साकी.....
...दिल पे कई बोझ है ,..और बोझिल शाम है बाकी ...





Sunday, 24 March 2013

मेरे क़ैद ज़ज्बात

अर्र्ज़ है ......
..........
वो यूँ नज़्म लिखता रहा ......
मेरे कब्र की आगोश में .......
.....................उसके आँसूं -ए  स्याह से .....
.....................मेरी प्यास बुझती रही ........
................................
................................
वो यूँ नज़्म लिखता रहा ......
मेरे कब्र की आगोश में .......
............
मेरी ये ख्वाहिश है कि ...अपने इस कलाम में कुछ और शब्द जोड़ पाऊँ ...

Thursday, 21 March 2013

"क्यों"

अर्र्ज़ है......
.......
...थमता नहीं है मन्ज़र....
...तेरी यादों का सपनों मे ...
...फिर नाम क्यूँ मिट जाता है तेरा.....
...जब लिखता हूँ अपनों में....
.............................
...कि अब  बहूत दूर चले आये...
...मौसमों का रंग भी पड़ गया है फीका...
...शायद अब वो मौज़ बीत गयी.....
...जब धड़कता था तू दिल बन कर
...धडकनों में ......
.............................

...थमता नहीं है मन्ज़र....
...तेरी यादों का सपनों मे ...
...फिर नाम क्यूँ मिट जाता है तेरा.....
...जब लिखता हूँ अपनों में....


 










"मेरी प्रथम कोशिश "

अर्र्ज़ है........

......दे दर्द ....
..... ऐ वफ़ा बेइन्तेहान इतना ....
......कि दर्द में ही सुकून मिले .......
......को गर ....
......मुझे नहीं तो, मेरे राख को ही सही …
......तेरी मुहब्बत नसीब हो ......
......वो ज़ज्बात वो जुनूं मिले ......
....................
......दे दर्द ....
......ऐ वफ़ा बेइन्तेहान इतना ....
......कि दर्द में ही सुकून मिले .......