कुछ रोज पहले, मुझे ऐसा लगा की मानो ....मेरा प्रतिविम्ब मुझसे बातें कर रहा हो…
उन्ही बातों को कागज़ पर सिमटने की कोशिश कर रहा हूँ ......
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हर रोज़ एक सपना देखता हूँ मैं ...
हर रोज़ इक सपना बदलता है .....
हाँ ये बचपना ही तो है मेरी ...की जो पूरा न हो सका तो ..
हर वो सपना मुझे खलता है ....
हर रोज़ मेरा इक सपना बदलता है .....
.............
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हर शाम क्षितिज़ पर पहुँच कर ...
ऐसा लगता है की मैं सीढ़ी ही भूल आया ...
डर लगता है की जैसे… शायद फूलों के बदले
हाथों में सिर्फ शूल आया ....
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या फिर ऐसा लगे ...
की जो इस मोड़ पर खड़ा है ....वो केवल परछाई है मेरी .....
खुद को तो बहुत पीछे ही कहीं ...खुद को मैं भूल आया ...
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आँखें बड़ी है इतनी ...
की संसार समा लेता हूँ ..
दिल बड़ा है इतना ...
की जरूरत हो किसी को मेरी ...
तो खुद को थमा देता हूँ ...
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फिर न जाने क्यों एक ...सूनापन सा महसूस होता है…
दबे सिसकारियों ...और मुस्कराते ओंठों के तले ....
अकेले में ये दिल रोता है ....
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न जाने क्यों …कि जग जीतने का घमंड रख कर ...
सब कुछ गवाए बैठा हूँ ....
टूट चूका हूँ .... लूट चूका हूँ ....
फिर भी न जाने क्यों ऐंठा हूँ ....
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न जाने कितनी बातें चलते रहते है ....मेरे उलझे हुए "सर" में ...
सच कहूं तो ऐसा लगता है .....की मिल गये जवाब सारे ....
इस पुडिये वाली ज़हर में ...
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पर लिखने वाले ये तो भूल ही गए ....मैं रोबोट नहीं आदमी हूँ
की बिखर जाऊं ये मंजूर है सही ....
लेकिन लड़ना तो मेरी फितरत में है ...
अभी तो एक चौथाही ही बीती है ...वक़्त अभी मेरे मुट्ठी में है ....
बदलूँगा मैं भी …ये वक़्त भी …मेरे बारे में सोचने वाले भी ....
.................
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अपनी जीत पर भी मैं ...खुद की कलम चलाऊंगा ....
आज मेरे हार की सुन लो…कल लौट के फिर आऊँगा
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कल लौट के फिर मैं आऊँगा .............
उन्ही बातों को कागज़ पर सिमटने की कोशिश कर रहा हूँ ......
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हर रोज़ एक सपना देखता हूँ मैं ...
हर रोज़ इक सपना बदलता है .....
हाँ ये बचपना ही तो है मेरी ...की जो पूरा न हो सका तो ..
हर वो सपना मुझे खलता है ....
हर रोज़ मेरा इक सपना बदलता है .....
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हर शाम क्षितिज़ पर पहुँच कर ...
ऐसा लगता है की मैं सीढ़ी ही भूल आया ...
डर लगता है की जैसे… शायद फूलों के बदले
हाथों में सिर्फ शूल आया ....
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या फिर ऐसा लगे ...
की जो इस मोड़ पर खड़ा है ....वो केवल परछाई है मेरी .....
खुद को तो बहुत पीछे ही कहीं ...खुद को मैं भूल आया ...
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आँखें बड़ी है इतनी ...
की संसार समा लेता हूँ ..
दिल बड़ा है इतना ...
की जरूरत हो किसी को मेरी ...
तो खुद को थमा देता हूँ ...
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फिर न जाने क्यों एक ...सूनापन सा महसूस होता है…
दबे सिसकारियों ...और मुस्कराते ओंठों के तले ....
अकेले में ये दिल रोता है ....
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न जाने क्यों …कि जग जीतने का घमंड रख कर ...
सब कुछ गवाए बैठा हूँ ....
टूट चूका हूँ .... लूट चूका हूँ ....
फिर भी न जाने क्यों ऐंठा हूँ ....
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न जाने कितनी बातें चलते रहते है ....मेरे उलझे हुए "सर" में ...
सच कहूं तो ऐसा लगता है .....की मिल गये जवाब सारे ....
इस पुडिये वाली ज़हर में ...
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पर लिखने वाले ये तो भूल ही गए ....मैं रोबोट नहीं आदमी हूँ
की बिखर जाऊं ये मंजूर है सही ....
लेकिन लड़ना तो मेरी फितरत में है ...
अभी तो एक चौथाही ही बीती है ...वक़्त अभी मेरे मुट्ठी में है ....
बदलूँगा मैं भी …ये वक़्त भी …मेरे बारे में सोचने वाले भी ....
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अपनी जीत पर भी मैं ...खुद की कलम चलाऊंगा ....
आज मेरे हार की सुन लो…कल लौट के फिर आऊँगा
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कल लौट के फिर मैं आऊँगा .............
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