Wednesday, 24 July 2013

"COMEBACK"

........THIS POEM IS DEDICATED TO OUR BELOVED ONE'S.....WHO GRACEFULLY.....EMBRACED THE WORDS....."TILL DEATH DO US APART"

………………………. 
इस जहां में… "मृत्यु" से बड़ी कोई सच्चाई नहीं …
… और जिंदगी में किसी मोड़ पर …. ये ख़याल …. 
कि इस पल के बाद सारी जीवित बातें …. किसी ख़ास के जाने के बाद …
……… यादों में तब्दील हो जाएगा …
… ये अद्वित्यीय … असाधारण …. तकलीफ़ है ………… 
…………… 
पर जैसे किसी ने ख़ूब कही है…. 
" वक़्त हर घाव को भर देता है … 
 और शायद इसी … कथन से प्रभावित हो कर ज़िन्दगी की साँसे कभी ………
…………. मौत जैसे ठोस सच्चाई के सामने भी दम नहीं तोड़ती …… 
…….....
मुझे अपने पढ़ने वालों …से उम्मीद है की …. 
…. शायद मेरे शब्द …. मेरे अलफ़ाज़ … आपको आपके अतीत में ले जाए …. 
… भूली बिसरी यादों के बीच ….जो कचोटती तो जरूर होंगी …. लेकिन जिनका एक मीठा अहसास भी जरूर होगा … 
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Hope.....My words evoke your past...your beautiful...sharings with beautiful people...
.....resting their Soul with Almighty.

....My poem is my respect to all those lovely "Remeberings" and those lovely ones's.....
............................X...........................
............................X...........................
… ना जाने क्यों …
 …. वो आँखें मूँद जाती है …
…. वो पलकें रूठ जाती है …. 
…………
जिन की रोशिनी में आप ……. 
देखना सीखते हो …. 
जिसके छावं तले …. 
आप स्वप्निल संसार में … 
क़दम रखते हैं …. 
………
जो ओझल हो जाए … 
क्षण के लिए भी अगर … 
मन बैचेन सा हो जाता था … 
छोटी … ना-समझ … डरी आँखें … 
बूढ़ी, प्यारी आँखों को …
टटोलने लगती थी …. 
……… 
और हर बार की तरह … 
वो आँखें लौट आती थी … 
मेरे व्याकुलता को स्पर्श करने के लिए … 
लेकि आज तो सिर्फ इंतज़ार है …उन आँखों का … 
पर कोई दस्तक नहीं …कोई हरक़त नहीं … 
यही कहीं …. शायद अब कभी नहीं …
…………
ना जाने क्यों …. 
उन उँगलियों में कोई थिरकन नहीं …. 
व़े हाथ स्थिर … बेज़ान पड़े हुए हैं ………. 
…………. 
कि  जिन उँगलियों को थाम ….
मैं सूरज को छुने निकल जाता था … 
की वही बूढी … अब मृत उंगलियाँ … 
जब तक मेरी रोटियों को तोड़ न ले … 
मैं निवाला खाता नहीं था …. 
याद है मुझे …. 
.......
की अभी भी अहसास है मुझे … 
उन ठोस उँगलियों का … मेरे गालों पर … 
और है यकीं अब भी… 
की तब भी… 
तकलीफ़ बंटती थी दोनों तरफ़ …. 
…… 
आज फिर से भूखा हूँ उन निवालों  का … 
थोड़ी प्यास भी लगी है … 
एक झुरमुट सा बन चुका है मेरे सवालों का … 
…. 
पर कोई हरक़त नहीं होती …
अब उन उँगलियों में …. 
की शायद मेरे गालों के चोट से … 
सुन्न सा पड़ गया है वो …. 
है फिर इंतज़ार मेरे दर्द को 
उन थपकियों की तमन्ना …. 
कोई थाम ले … 
मेरी कांपती उँगलियों को आ के … 
……….
पर कोई दस्तक नहीं …कोई हरक़त नहीं … 
यही कहीं …. शायद अब कभी नहीं …
……
ना जाने क्यों वो अमर्त्य शरीर … 
ठंडा पड़ गया है …. 
की सभी को थाम कर रखने वाला मेरा भगवान …. 
खुद मौत से ही डर गया है … 
…… 
वो लौ … 
क्यों बुझ गयी … 
जो खुद एक नूर था … 
क्यों खुद वहां जाने की ज़िद कर बैठा … 
जब रखता मुझको दूर था … 
………. 
अब कौन मुझको गोद लेगा … 
अब कौन थामेगा मुझे … 
कौन रातों को जागेगा … 
जब नींद न आएगी मुझे … 
…. 
अब कौन मेरी …
बिमार काया को ताप देगा … 
जब खुद का शरीर … 
ठंडा पर चुका … 
है ये भी अब तय की … 
अब वो लौट कर ना आने  वाला … 
की शायद अब वो मर चुका …. 
…………. 
पर चौंकता है ये खुद- गर्ज़ मन अब भी … 
है गुज़ारिश … 
की एक दिव्य झोंका सा आये … 
की त्रिलोक को भी ठग कर …. 
कहीं से एक धोंखा यूँ आये 
……… 
की उन बूढी उँगलियों में … 
वो थिरकन लौट जाए … 
जिसके लिए धड़कता था दिल मेरा …
वो धड़कन फिर से लौट आये ….
…………
घर के कोने में …. 
किसी काले  कमरे में … 
कई घंटों से … 
कुछ ऐसे ही फ़िज़ूल … 
असंभव ख्यालों में खोया हुआ हूँ मैं …. 
… इंतज़ार है किसी का …. 
या कोई खबर ही सही … 
………
पर कोई दस्तक नहीं …कोई हरक़त नहीं … 
यही कहीं …. शायद अब कभी नहीं …
……
की शायद अब तो …
सब लौट आये हैं … 
किसी को दफ़न कर के … 
छट रहा है … 
मेरे लगाव का अँधेरा ……
हो रहा हूँ ….  तैयार कल के लिए … 
कई काम है बांकी …. 
उस नाम का वजूद है बांकी … 
……. 
की कोई शायद चिढ़ाता है मुझे ….
की कई …. और भी चोट है …. 
भगवान् के मन में …. कई और खोट है … 
ये तो तेरी परिक्षा की …. 
पहली झांकी है … 
तू जिनके बिना …. 
न जीने की क़सम खाता था …. 
कई और बांकी है …. 
कई और बांकी है …. 
………
तुम झूठे … या फिर वो क़सम झूठे …. 
तुम झूठे … या फिर वो क़सम झूठे …. 
तुम झूठे … या फिर वो क़सम झूठे …. 

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