Monday, 29 September 2014

"मरणासन मनुष्य" (दम तोड़ती संवेदनाएं )

आजकल के भीड़ में …… 
नित  परिवर्तित "देह" चिर में ……
ठंडी पड़ी इस क्षीर में ……… 
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उन जज़्बातों को भी उभरने का समय नहीं मिल पाता। ................
जो की ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर, हमारे साँसों का पर्याय बन चुकी थी ………………
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वे संवेदनाएं भी मर चुकी है ………
जो कभी हमें संस्कारों के रूप में विरासत में मिली थी ………
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वो ख्याल, यादें भी भ्रमित करती है ………
जो, ओंठों पे मुस्कान या आँखों में आंसूं का सबब बनते थे  .............

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हम
इस प्लॉस्टिक से निरंतर बनती हुयी दुनिया के मायाजाल में, इस तरह उलझते जा रहे  हैं ……………
भौतिक ... क्षणिक खुशियों के अंधे दौड़ में इस तरह से शामिल होते जा रहे हैं ......................
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की हमें तब तक किसी की याद नहीं आती ……
कि....
जब तक कोई महफ़िल न सजे
कोई हमें रूह तक झकझोर न दे
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मेरा ये कलाम …………
इसी "बेरंग" दुनिया को आइना दिखने की एक छोटी सी कोशिश है ……………
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ऐसा लगता है की, प्लास्टिक के इस दुनिया में ………
रबड़ से बने लोगों के बीच,
"जज़्बातों" को भी धुप लगाना जरूरी है ………
वरना
ये भी "कूड़े-करकट" में तब्दील हो जाएंगे ………
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कुछ बू इस क़दर फैली है ………
आजकल इस जहाँ में ………
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए ………
एक सुरूर होना चाहिए ………
कोई सामने जरूर होना चाहिए ………
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न जाने, ये कौन सी जात है ………
इंसानियत की ………
की ज़िंदा लोगों से डर लगता है ………
की, मुहब्बत भरी निगाहों का भी, नज़र लगता है ………
बंद दरवाज़ों के पीछे ………
खिरकियों के परदे तले ………
बंद लोगों को वही शहर लगता है ………
और ………
न जाने क्यों, लोग तभी अच्छे लगते हैं ………
या किसी पे बेशुमार प्यार आने के लिए,
उसका मरना जरूरी है ………
या, वो हमसे ………
दूर बहुत दूर होना चाहिए
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की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होना चाहिए 
कोई सामने जरूर होना चाहिए 
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अब कहाँ वो आशिक़ी का आलम 
वो सूरत सीरत की बातें 
वो दास्ताने "हीर-रांझा" की 
एक दूसरे के निगाहों में डूब कर 
बितायी गयी रातें 
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अब दिल सीने में नहीं, धड़कता है हथेलियों पर ………
न परवाह, लैला है या हीर है ………
है जरूरत की बस ………
कोई नूर होनी चाहिए ………
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की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होना चाहिए 
कोई सामने जरूर होना चाहिए 
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और, जब हालत ऐसे बन ही चुके ………
और, सच्चाई कोसती है हर पल ………
की अब बर्दाश्त नहीं होता ………
खुद को धोखे में रखना ………
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की 
देश - प्रदेश 
प्यार - मुहब्बत 
माँ - बाप 
रिश्ते - नाते 
छूटते चले जा रहे हैं, पीछे हर पल 
और 
अगर उनकी याद ही आती है जब, कोई 
जोरों, से झंझोरता है 
किसी महफ़िल के प्यालों के सुरूर में 
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तो मेरी मानिए 
ए-हुज़ूर 
ऐसी सुरूर के लिए 
टूटे गरूर के लिए 
ऐसी महफ़िलें 
यदा-कदा ही सही 
तेरे घर, या मेरे ठौर पे सही 
ऐसी महफ़िलें 
जरूर होनी चाहिए 
जरूर होनी चाहिए 
की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होनी चाहिए 
एक सुरूर होनी चाहिए
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की जज्बातों को भी उमड़ने के लिए 
एक सुरूर होना चाहिए 
कोई सामने जरूर होना चाहिए 
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